This Allama Iqbal sh'er is slightly altered :
कभी ऐ हकी़क़त-ऐ-मुन्तज़र नज़र आ लिबास-ऐ-मजाज़ में
के हज़ारों सजदे उमड़ पड़े हैं मेरी जबीं -ऐ -नियाज़ में
हकी़क़त-ऐ-मुन्तज़र - unfolding fate
मजाज़ - manifest
लिबास-ऐ-मजाज़ - show up in physical form
original :
"के हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मेरी जबीं -ऐ -नियाज़ में "
* * *
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
Bizarre House - II
The house we lived in Kanpur was a soldier’s barrack turned into quarters. A long shed like structure converted into four dwelling units, m...
-
शिशिर कणों से लदी हुई कमली के भीगे हैं सब तार चलता है पश्चिम का मारुत ले कर शीतलता का भार भीग रहा है रजनी का वह सुंदर कोमल कबरी भाल अरुण किर...
-
सवाल उठता है की क्या समाज में नैतिक व्यवहार (ethical behavior) धर्म की वजह से है और अगर ऐसा है तो धर्म की आवश्यकता अपरिहार्य है अन्यथा धर्म ...
-
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत पर जब एक थका हुआ सा Post- Impressionism आखिरी साँसें गिन रहा था, हेनरी मातिस की अगुवाई में एक क्रांतिकारी आन्दोलन ...
No comments:
Post a Comment