Wednesday, July 16, 2008

K R I T I - K A L A

कृति काला
(3rd August 1988 - 6th July 2008)
अगर वह कभी गंभीरता से गुस्सा हुई है तो सिर्फ़ मासूम बचपन में । एक लंबे समय तक वह जापानी गुड़िया की मानिंद नज़र आई । वह किसी भी अन्य लड़की की तरह थी, मासूम आकर्षक और जिज्ञासु; गहरे नीले रंग की स्कर्ट और चटक लाल धारियों की चेक्स की शर्ट वाली युनिफोर्म में वह बेहद आकर्षक नज़र आती थी । उसे अपना स्कूल बैग और पानी की बोतल स्वयं धारण करना पसंद था, शायद इस से उसे अपनी आज़ादी और अहमियत का अहसास होता था। स्कूल जाते वक्त वह ज़ोर दे कर अपनी माँ से कहती "तू मेरे पीछे पीछे मत आ!" ऐसा न करने पर वह गुस्से में वहीं खडी़ हो जाती। माँ हताश वापस मुडती और मोड़ पर पेड़ के पीछे छुप कर उसे स्कूल जाते देखती। नर्सरी स्कूल कुछ ही दूर था , वह सावधानी से सडक के किनारे किनारे चल कर स्कूल जाती , रुक रुक कर पीछे देखती के कहीं माँ पीछे पीछे तो नही आ रही है! उसका वह अक्स आज मेरे ज़ेहन में फ्रीज़ फ्रेम की तरह दर्ज है।
कई मायने में वह उसकी तरह ही थी, संवेदनशील, उदार और फिर एक जुदा से अंदाज़ में विद्रोही भी। हैरत के एक विशिष्ट अंदाज़ में उससे एकदम भिन्न भी! " सॉरी ! " उसके होंठों पर आसानी से चढ़ता था चाहे वह सही हो या ग़लत इसका सबूत उसके दोस्तों की एक लम्बी फेहरिस्त में था।
जब वह हवाई अड्डे के लिए सुबह की उड़ान पकड़ने के लिए जा रहा था के एक कॉल , "पापा ! वापस आ जाओ, कृति का एक्सीडेंट हो गाया है! अब वह नही रही ।"
..
ज़िंदगी मेरे लिया सदा के लिए बदल गई ...............
.......

Friday, June 13, 2008

कुलदीप सिंह


सुन लीजिये फुरसत है फिर क्या हो खुदा जाने
कब से हैं मेरे दिल में बेताब कुछ अफ़साने

------------------------जोश मलीहाबादी

हर किसी की तरह मैं भी इस संदेह का शिकार था कि प्रकृति एक भव्य साजिश के तहत मुझे ज़िंदगी में हमेशा नाकामयाब बनाए रखना चाहती है। मैंने अपने को जीवन में अक्सर अवसर से एक कदम पीछे पाया, जैसे के जब मुझे जब ' युवा बाबू ' होना चाहिए था में 'नन्हा बाबू था और जब 'परिपक्व बाबू' होना चाहिए था उस वक्त में ' युवा बाबू ' था। कुलदीप सिंह अंतरफलक मेरे जीवन में पलक झपकते ही गुजर गया लेकिन वह मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण मरहला था। कुलदीप एक सिख था , अनिच्छुक नहीं , बल्कि एक उदासीन सिख; तर्कसंगत और बहुत ही परिपक्व जो जीवन को बहुत ही गहराई से और निष्पक्ष अंदाज़ से तोलता था। कुलदीप धूम्रपान करता था , सिखों में एक अपवाद ख़ास तौर पर एक छोटे से कस्बे में है . हम 'Flower Childern' के दौर में कुछ वक्त देर से आए, यह दौर अब ढल रहा था । 'बीटल्स ' का उफान थम रहा था और 'बेलबाटम्स' संकरे हो रहे थे किंतु 'संताना' का जादू आज भी हमें उद्वेलित करता था और 'साउन्ड ऑफ़ साइलेंस' कि मधुर धुन हमें मदमस्त कर देती थीं . कभी कभी हम मारिजुआना और चरस का भी इस्तेमाल कर लेते थे , मैं कुछ अपराध भाव से और कुलदीप लोकाचार की उपेक्षा करते हुए उत्सुकता और सुख कि चाह से। वे दिन पैसों की तंगी के थे , जब जेब खाली हो सिगरेट के फेंके हुए टुकड़ों से काम चला लिया जाता था । कुलदीप ने सिगरेट के मांसल टुकड़ों को एकत्र करने का एक नायाब तरीका़ हासिल कर लिया था। सरकंडे कि छड़ी पर एक पिन लगा कर शाम के वक्त जब हम घूमने के लिए निकलते, कुलदीप सिगरेट के उन उपयोगी टुकड़ों को बड़ी आसानी से पाकेट में पहुँचा देता। इस काम में उसने अच्छी खासी महारत हासिल कर ली थी और बिना किसी की नज़र में आए सिगरेट बटोरने के काम को वह बखूबी अंज़ाम दे देता था। किंतु तंगी का ये दौर सिर्फ़ महीने के अंत तक ही रहता था और जैसे ही महीने के शुरू में घर से मनी आर्डर चला आता , हम फिर अपनी ब्रांड 'Wills' पर लौट आते। . हमारा हॉस्टल काफ़ी 'avante -garde' था इसलिए कुलदीप का सिगरेट पीना, जो भी कुछ सिख विद्यार्थी वहाँ थे, उन्हें नागवार ज़रूर लगता पर बर्दास्त के बाहर नही ! किंतु जब स्टाफ के एक सिख ने कुलदीप को सिगरेट पीते देख लिया, बस कहर बरपा हो चला !

वह सर्दियों में रविवार की एक आलस भरी सुबह थी। हमारे कमरे छात्रावास के भूतल पर थे, सिर्फ़ चार कमरे हमारे दरमियाँ! उस रोज़ मैं जनवरी के मद्धम सूर्य की धूप का सेवन करते हुए, हाथों में एक झागदार टूथब्रश लिए छात्रों के विशिष्ट अंदाज़ में फर्श पर बैठा दांतों को ब्रुश कर रहा था। अभी सुबह के सिर्फ़ नौ बजे थे और एक मूर्ख जिसे वक्त का ज़रा भी अहसास न था, ऑल इंडिया रेडियो से बेगम अख्तर की मशहूर-ऐ-ज़माना ठुमरी "ऐ मुहोब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया … ... ' बजा रहा था। उस वक्त बेगम की ये स्वर के साथ कुश्ती " रोना ...आया । । ॥ रो नअ आ आया " बहुत ही बेहूदा लग रही थी॥ खंभों कि छाया हॉस्टल के गलियारे को एक बाघ के धरियुं कि तरह प्रकशित कर रही थी। छात्रों के कई समूह कुछ कुछ दूरियों पर गपशप में मशगूल थे। कुलदीप अभी तक सो रहा था।

उस वक्त मैंने देखा, सिखों की एक मंडली जिनमें कुछ रंगीन लिबास पहने, कमर में किरपान बांधे हुए और कुछ अपनी सफ़ेद दाढी लहराते, गलियारे के अंत से मेरी ओर तेजी से आ रही थी। वे लोग कुछ इस कदर संजीदा और शांत थे के उनके आने का आभास ही न होता था, मानों वे हवा में तैर रहे हों। वे छात्रों के समूह को इस तरह पार कर गये मानों उनका कोई वाज़ूद ही न हो। जब वे मेरी नज़दीक पहुंचे तो डर की एक लहर मेरे शरीर में व्याप्त हो गयी। परन्तु मेरा डर बेवज़ेह था, इन लोगों ने मुझे घूरा फिर बिल्कुल ही नज़रंदाज़ कर दिया और कुलदीप के कमरे पर जाकर ठहर गए। अचानक ही उन सभी में शक्ति का संचार हुआ और वे कुलदीप का दरवाज़ा बे-सबरी से खटखटाने लगे। कुछ ही पलों में नाराज़ कुलदीप ने दरवाज़ा खोल दिया। इस से पहले के वह कुछ बोलता , सिखों ने कमरे में प्रवेस किया फिर कुलदीप को अन्दर खींच कर दरवाज़ा ज़ोरदार आवाज़ के साथ बंद कर दिया। फिर एक लंबा दौर फुसफुसाहट और शोर शराबे का शुरू हुआ। अब तक दुसरे छात्र भी वहाँ पहुँच गए थे और विभिन्न अटकलबाजी़ में व्यस्त हो गए। ये सिलसिला तक़रीबन बीस मिनटों तक चलता रहा और फिर एक ज़ोरदार कोरस "जो बोले सो निहाल, बोलो सतश्री अकाल" के साथ खत्म हुआ।

अब सभी सिख एक क़तार में बाहर आए, उनके चेहरे अभी भी गंभीर थे । संदेह और संतोष की मिश्रित भावनाओं के साथ बे-आवाज़ ,बेलाग लपेट उसी तरह, जिस तरह के वह लोग आए थे , वापस चले गाए।

हम सभी एक अंदेशा भरी निगाहों से कुलदीप के दरवाज़े पर टकटकी लगाये खड़े थे। कुछ आशंकित और कुछ अनहोनी के भय से कुलदीप के निकलने का इंतज़ार करने लगे।! लेकिन आश्चर्य! कुछ ही देर में एक नाराज़ और कुछ शर्मिंदगी में डूबा कुलदीप बाहर आया।
" क्या हुआ ? " मैंने पूछा
" कुछ नही यार!" उसने कहा फिर क्रोध में बोला," ये सिरफिरे! शराब तो ठीक है , सिगरेट नहीं , कतई नहीं ! "

उसने मेरी तरफ़ देखा और बोला, "क्या तेरे पास इस वक्त पाँच रूपये हैं?"
मैंने मुंह बनाया और बेमन से कहा, "हाँ!"

कुछ ही पलों हम नजदीक के हज्जाम के पास गए जहाँ कुलदीप ने पहली बार दाढी और अपने लंबे केश ट्रिम करवाए। एक बार जब बाल और दाढी कट गई, कुलदीप ने अपने आप को पहली बार इतना हल्का और आज़ाद महसूस किया, जो उसके चेहरे पर बखूबी झलक रहा था। मैं हमेशा से पढ़ाई, पॉलिटिक्स के ज्ञान और आर्ट्स के संधर्भ में कुलदीप से कहीं बेहतर था , फिर भी मैं उस की ज़िंदगी पर तीक्ष्ण पकड़, जीवन की जटिलताओं को समझ पाने और आसानी से सुलझाने की कला से आश्चर्यचकित था। उसका ज़िंदगी को जीने का अंदाज़ मुझे गहराई से प्रभावित करता था। उस ने एक गहरी सांस ली जेब से सिगरेट कि डिब्बी नकली और एक सिगरेट सुलगा ली। एक बहुत ही गहरी कश लगा कर निकोटीन को अपने फेफड़ों में घुलने दिया और धुआं मेरे तरफ़ फेंका जिस से मेरे चेहरा ढँक गया। कुछ देर सोच कर उसने दार्शनिक अंदाज़ में कहा,

डरता हूँ असमान का जादू न टूट जाए
लब पर कोई सवाल सा आया हुआ तो है!

मैं हैरत में था! एक अजी़बो-ग़रीब 'स्किजो़फ्रेनिक' कायापलट से मैं काली हवा से 'नन्हें बाबू' में बदल गाया। एक मासूम नासमझ के मानिंद मैंने अपने सिर के झटका,
"इस का क्या मतलब है? " मैंने पूछा
उस ने मुझे एक लंबी और गहरी व तीक्ष्ण द्रष्टि से देखा और पहेली के अंदाज़ में कहा,
"ये तो फिलोसोफी है ! "

मुझ में उसकी सोच पर प्रश्न उठाने का साहस नहीं था इसलिए जो भी कहा गया उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। लेकिन उसके ये शब्द मेरे अन्तःकर्ण कि गहराइयों में समा गए और रह रह कर झंकृत होने लगे। आज तक ये शब्द मेरे अवचेतन में लिपिबद्ध हैं कभी कभार उभर कर मुझे उद्वेलित करते रहते हैं।

डरता हूँ असमान का जादू न टूट जाए
लब पर कोई सवाल सा आया हुआ तो है!

"सचमुच क्या फिलोसोफी है!"

Sunday, May 18, 2008

Mushaira

Some years back while playing online Bridge I was listening (not watching) to this Mushiara telecast live on ETV Urdu from Malegaon, Maharashtra. It was a very big show, some 5000 – 10000 people had gathered. Malegaon has large Muslim population therefore the popularity of the Mushiara. After a while I decided to record it and then forgot about it.

Since I was playing Bridge therefore not much registered at that time but listening to it yesterday I found some good poerty in it. May be you will like it. Some poets have very powerful voices and recited their ghazals in tarranum.

There is powerful ghazal at the fag end

woh koi jaanwar ho, parindaa ho, ya ke inshaan ho
bhatak gaya to yaqeenan shikaar hota hai.

Hope you will like it.
http://kalihawa.googlepages.com/mushayara1.mp3

Saturday, May 17, 2008

साया

साया बेचेहरा होता है
जज़बात भी नही
बेआवाज़ भी
कोई साया चुरा ले
हम बेलिबास हो जाते हैं
नरगिस* भी एक साया था
मौत का साया
दबे पाँव आया
क़ज़ा रक़्स हुआ
और ख़ामोश चला गया
नरगिस से क्या शिकवा?
७७००० हलाक हुए
७००० नरगिस कि बाहों में
७०००० हुकूमत ने क़त्ल किए

Wednesday, May 07, 2008

बर्फ गिरती रही मेरे चेहरे पर

कुछ सोच कर मै उठा
चल दिया तनहा तनहा
चुप था दरख्तों का सिलसिला
बर्फ गिरती थी मेरे चेहरे पर

निहां भी और मुका़बिल भी
था भी नही भी इक अजनबी
करता था बातें कभी कभी
बर्फ गिरती थी मेरे चेहरे पर

पूछा जो मैंने तू कौन है
हंस के बोला, गौ़र से देख
नही कोई और तू ही तो है!
गिरती थी बर्फ मेरे चेहरे पर

ताहम, कुछ है अज़ीबो ग़रीब
क़िस्मत जो तेरी जिस्म ही नही
न तुझ को भूख न तिस्नगी
बर्फ मेरे चेहरे पर गिरती रही

हैरत से देखा उसने मुझे
तो क्या हुआ जो जिस्म ही नही
तुझ को भी तो ज़ायका़ नसीब
गिरना बर्फ का अब कम हुआ

बातों मी तेरी कुछ तो है
ये सवालात और गहराइयां
तस्व्वुफ़ ऐ ज़िंदगी कि अनुभूतियाँ
गिरना बर्फ का थम सा गाया



अभी बाकी़ है..........................





Thursday, April 10, 2008

नीली आंखों वाला बादल

कल
वह जो नीली आंखों वाला बादल
घूम रहा था
आसमान में बस्ता लेकर
कभी इधर कभी उधर
और हवा की उंगली पकडे
जूते मुंह से खोल रहा था
पीपल के पत्तों से जाने
किस भाषा में बोल रहा था
उस कहना कल फिर आए
मुझे छांव के गीत सुनाये
मई उसे लौलीपॉप दूंगा!

अज्ञात

बूट !

जूते में वह बात कहाँ !
बूट का वह रुतबा कहाँ
उस में वह दम ख़म नही
तेज़ -ओ - तर्रार अदा कहाँ
मुलायम गोष्त पर जब पडता
है ख़ुद ब ख़ुद चमक उठता है
जूता अव्वल तो बदन पर उठता नही
जो उठा भी तो पिल -पिला हो जाता है
बूट पुराना नही होता फेंक दिया जाता है
जूते का नसीब घिस जाना है
सुराख़ होने तक रगड खाना है
अफ़सोस के 'चीन' के पास बूट है
मासूम 'तिब्बत' जूते पे रोता है !


काली हवा

रात 12 बजे चंडाखाल की सैर

चंद रोज़ क़बल मोहतरम मोनू साहिब की श्री बडोलगांव आमद हुई। जनाब 3 किलो मुर्गा लेकर हाज़िर हुए और फर्माइश की कि मुर्गा भड्डू मे ज़ेर-ए-आसमान प...