Thursday, August 06, 2026

Bizarre House - II

 The house we lived in Kanpur was a soldier’s barrack turned into quarters. A long shed like structure converted into four dwelling units, may be the word “quarter” comes from there. Ours’ was the corner unit on the main road side and the far end towards MI room. A long, covered veranda on the front ran through the entire length of the building.

But the peculiarity was not the barrack like construction of the house, it was a mysterious door between our house and the adjoining unit. We had put a heavy wooden box snugly filling its frame lest no one would inadvertently open it and intrude privacy of neighbour and vice versa. A similar box was sitting on the other side of the door for similar reasons as ours. It was clear what was behind the door and yet it looked mysterious to little Babu who would often stare at it.

In summers we would take out “khatia” (bamboo cots, very light weight) put them under open sky, put up mosquito nets and sleep outdoors. Once Shubhakar told us that he saw a ghost making rounds of Ber tree in front of the house dead at night. I was gullible so believed him. From then on, whenever I woke up briefly in the middle of night, I would furtively look at the Ber tree, if the ghost was there making rounds. Once I was so much primed with fear that I actually felt a shadow like thing made round of that tree and as soon as it turned my way disappeared.

Of course, it could be real but most likely a false visual induced by fear.

Bizarre House - I

Of all houses where I have lived and I have lived in many of them, 14 Mumfordgunj was quite intriguing and bizarre. It was built like a child adding parts to a sand castle, sneaky narrow stairs, and suspended in air crossover ramp. Pillars rising from nowhere and stairs going on and on without fold leading to a large terrace. “Lois Kuti” was the name of that formidable building, underneath that name was printed H Williams. Façade did not open to a regular road instead a brick paved gully lead to it. The approaching end from the main road was neat but that gully ended in crossing where tabellas with buffaloes and cows, their muck painting it into a dismal gloomy locale.  Right across the gully there was a large open space and beyond that was another locality funnily called Balrampur House a posh colony of collages. From our perch we can a standalone house belonging to “Pahadi ji”. Some guy Rama Prasad Ghildiyal “Pahadi” who wrote children’s book.     

We lived on the upper floor, H Williams downstairs in dark chaotic section. His wife an absentminded frail lady and occasional visitors to his home, a spinster daughter, a choleric limping son Vimal and another estranged son and his wife. It was an interesting household.

Thursday, December 18, 2025

रात 12 बजे चंडाखाल की सैर

चंद रोज़ क़बल मोहतरम मोनू साहिब की श्री बडोलगांव आमद हुई। जनाब 3 किलो मुर्गा लेकर हाज़िर हुए और फर्माइश की कि मुर्गा भड्डू मे ज़ेर-ए-आसमान पकाया जाय। जनाब से कोताही रह गई पारा पारा गोश्त फौरन ही फ्रिज के हवाले न किया नतीज़तन बू से सराबोर हो गया। जनाब-ए-काली हवा से इलतिज़ा की गई के साहिब फ़ैसला करें। साहिब-ए-इल्म कश्मकश मे आ गए, नाज़ुक मुक़ाम था, एक तरफ 3 किलो गोश्त ओ दूसरी जानिब सेहत का सवाल। दलील रही, गोश्त हर लिहाज़ से ताज़ा नज़र आता था सो जोखिम भरा फैसला रहा, काबिल ए इस्तेमाल है। भड्डू 3 किलो मुर्गे के लिए नाक़ाफी साबित हुआ लिहाज़ा जनाब सुदर्शन, जो उस रोज़ खानसामा के किरदार मे थे, गांव का बडा पतीला लाये और सियाह फ़लक तले धीमी ऑच मे मुर्गा पका।

एक बोतल कैंटीन की रम जो मियां सुदर्शन ने मुहय्या की थी, मोहतरम शुभाकर के एहतराम की एवज़ ख़ारिज- ए-इस्तेमाल रही। तब जनाब राजेश ने मैक्डावल न -1 लाने की पेशकश की जिसे फौरन ही मंज़ूर कर लिया गया।

जब मुर्गा फतह हो गया उसे भड्डू मे पनाह दी और उसी पतीले भात पकाया गया। मोनू साहिब उस जश्न की शाम या तो सनक गए थे या नशे मे थे, 5 किलो चावल पतीले के हवाले कर दिया, रोटी अलग बनी । कुल 13-14 अफराद खाने वाले थे सो खाना इफरात मे बना।

अब बारी शराब की थी उस का ज़िक्र भी लाज़मी है।

कुल पीने वाले 6 शख्स थे, खाकसार और शुभाकर के एलावा 4 अफराद। खाकसार और शुभाकर ने 1.5 पेग लिए एक और फर्द ने भी तक़रीबन इतना ही डकारा । पहले मैक्डावल फना हुई फिर रम की तबाही ।

रात के 11:30 बजे पार्टी तमाम हुई लेकिन ड्रामा बाक़ी था। हौग की तरह खाने के बाद 12 बजे रात हेमंत ने मुझे मोटरसाइकिल पर बैठ चंडाखाल चलने की दावत दी जिसे मैने बेहिचक मंज़ूर कर लिया।

जिस तरह मोटरसाइकिल लरज़ रही थी उससे खाकसार का कांफिडेंस डगमगा रहा था लेकिन जल्दी ही हेमंत ने आपा क़ाबू मे कर लिया और चाल मे जदीद रवानी आ गई। घाट पर हम रफ्तार मे थे हेडलाइट की रोशनी आडी तिरछी लकीरें बना रही थी। आगे एक खरगोश बेसाख्ता दौडा चला जा रहा था उस नादान को इल्म न था किनारे हट जाये। जब वह बदनसीब थक कर निढाल हो गया एक दूसरा हमशक्ल खरगोश हमे एस्कार्ट करने लगा । पानी की टंकी पर हेमंत ने पडाव डाल दिया।

वहां हम कोई आधा घंटा गुफ्तगू मे रहे, तमाम मुद्दों पर राय शुमारी हुई। ये एक बेमिसाल तजुर्बा रहा। रात के दूसरे पहर दसवीं के चांद की रोशनी पेड के पत्तों से छन कर जिस्म को मयनोश कर रही थी । ज़हन के एक गोशे मे गुलदार का खटका बना था और हेमंत अपनी रौ मे बके जा रहा था और मे किसी दूसरे आलम मे मदहोश था। जब मैने पूछा, तुम्हे यहां खौफ नहीं होता ? तब उसने कहा, वह अक्सर ही तन्हा यहां रात बे रात आ जाता है। सिद्धबाबा पर उसका कॉन्फिडेंस ताज्जुब से भरपूर था ।

जब हम लौट कर घर की तरफ चले खरगोश का सिलसिला फिर शुरू हो गया । गदन पार घर की तरफ मुड़ते हमने देखा वहां घास पर तीन बन्दे ज़मींदोज़ हैं। हमे देखकर उन्होने सिगरेट की गुजारिश की । ये तीन शख्स ग़ालिबन घर जाने से डर रहे थे ।

Sunday, August 03, 2025

अहंकार

 कृष्ण गन्धवह बड़ा हुआ और पिता की आज्ञा ले कर देशाटन  को निकल गया।  मेधावी तो था ही शास्त्रार्थ में दिग्गजों को पराजित कर, अभिमान से भरा  वह नगर नगर प्रवास करता प्राचीन नगर श्रावस्ती जा पहुँच गया। राजदरबार में उसका समुचित आदर हुआ परन्तु वहां के दयालु राजा को  उसका अहं कदापि न भाया। अपने मंत्री से उसने पूछा, 'क्या कोई उपाय है के इस परम विद्वान ऋषिपुत्र का अहंकार टूट सके। मंत्री ने कहा, राजन इस नगर में तो कोई भी कृष्ण गन्धवह की विद्धवता के सामने नहीं ठहर सकता परन्तु  नगर पर्यन्त वन के बीच बहने वाली मालिनी नदी के तट पर एक मृदुल स्वाभाव वाले वृद्ध ऋषि काली हवा  का निवास है। संभव है वे कृष्ण गन्धवह को शास्त्रार्थ में न हरा सकें परन्तु विनम्रता पाठ अवश्य पढ़ा दें। फिर क्या था राजा ने मंत्री को आदेश दिया की कोई ऐसा प्रकरण करें  के कृष्ण गन्धवह ऋषिवर काली हवा के पास जाने को आतुर हो उठे। तदनुसार मंत्री महोदय ने योजना बनाई।  अगले दिन प्रातः ही महल में कृष्ण गन्धवह के कक्ष की वातायन के नीचे प्रांगण में कुछ प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा वाद विवाद प्रारम्भ करवा दिया की क्या कृष्ण गन्धवह , ऋषिवर काली हवा से शास्त्रार्थ कर सकेंगें।

प्रातः ही कोलाहल सुन कृष्ण गन्धवह अचरज में पड़ गए, सेवक को बुला भेजा की पता करे क्या प्रकरण है,  बल किलै बूढ़े जन भिभड़ाट करणा छन। तब सेवक ने आ कर सूचित किया के वयोवृद्धगण अटकलें लगा रहे  हैं कि सम्प्रति कृष्ण गन्धवह सभी प्रबुद्ध मुनिवर को शास्त्रार्थ में  पराजित कर चुके हैं किन्तु क्या वे मालिन नदी के तट निवास कर रहे ऋषिवर काली हवा से भी शास्त्रार्थ करेंगें। फिर क्या था, कृष्ण गन्धवह उसी क्षण राजा के समक्ष प्रस्तुत हुए और अपने प्रस्थान की सूचना  दे  डाली। राजा के आग्रह पर भी वे  रुकने को तत्पर न हुए और बताया कि  वे अब मलिन नदी तट निवास करने वाले ऋषिवर काली हवा से संवाद करेंगें। तब राजा ने  सैनिकों की एक टुकड़ी और एक अलंकृत हाथी का प्रबंध कर दिया।  अहं में डूबे कृष्ण गन्धवह को ये सम्मान भाया तो परन्तु इसे अपना अधिकार समझ उसने राजा को धन्यवाद भी नहीं किया और वन की तरफ प्रस्थान कर दिया।  इधर मंत्री ने पहले ही अपने गुप्तचर को ऋषिवर काली हवा की कुटी की ओर रवाना  कर दिया था ताकि ऋषिवर को इस आकस्मिक आरोहण से विषमित न होना पड़े। उधर जब ऋषिवर काली हवा को पता चला के महर्षि तुंडकेतु के तेजस्वी पुत्र कृष्ण गन्धवह उनसे शास्त्रार्थ के लिए आ रहे हैं तो वे अचंभित रह गए भला उनका और कृष्ण गन्धवह का क्या मुक़ाबला। परन्तु जब गुप्तचर ने राजा आनंदकर का अनुरोध बताया तब वह विचार  मग्न  हो गए फिर गहन उस्वास लेकर कहा अतिथि का सत्कार तो होना ही चाहिए ।

जब कृष्ण गन्धवह सजे धजे हाथी पर बैठ वहां पहुंचा तब काली हवा दुविधा मैं पड़  गए , इतने लोगों का सत्कार मैं कैसे कर पाउँगा।  उसने कहा, ऋषिपुत्र आपका स्वागत है। आपकी विद्धवता के चर्चे नगर नगर प्रचलित हैं अतः आपका यहाँ आना अहोभाग्य परन्तु इस लश्कर के साथ आने का प्रयोजन ? तब तुंडकेतु पुत्र कृष्ण गन्धवह ने कहा, ऋषिवर यह वन हिंसक पशुओं से भरा पड़ा है अतः राजा आनंदकर ने ये लश्कर मेरा साथ लगा दिया था।  मेरा यहाँ आने का प्रयोजन आपसे शास्त्रार्थ करना है। काली हवा, ऋषिपुत्र मैं तो यहाँ बिना किसी भय के निष्कंटक और निरापद रह रहा हूँ अतः सैनिकों की यहाँ कोई अवस्य्क्ता नहीं है अतः हमें इन सैनिकों को विदा कर देना चाहिए अतिरिक्त इतने बड़े समूह का मैं आतिथ्य भी नहीं कर पाऊँगा। कृष्ण गन्धवह, ऋषिवर आप बार बार मुझे ऋषिपुत्र कह कर मुझे लघु बना रहे हैं और मेरे पांडित्य का अपमान कर रहे हैं अतः मुझे मेरे नाम से ही सम्बोधित करें। रही बात सैनिकों की तो आप उचित कह रहे हैं , इनका यहां कोई कार्य नहीं अतः इन्हें विदा कर सकते हैं।  फिर सभी सैनिकों को आदेश कर दिया की वे नगर लौट जाएँ।  

सैनिकों के जाने पर शास्त्रार्थ को आतुर कृष्ण गन्धवह ने कहा , मुनिवर अब हम शास्त्रार्थ कर सकते हैं।  इस पर मुनिवर ने उत्तर दिया , हे कृष्ण गन्धवह, अभी तुम यात्रा कर के आये हो, थके हो अतः कुछ आराम  कर लो तब तक मैं भोजन की व्यवस्था करता हूँ।  कल प्रातः स्नान और जलपान के बाद ज्योति प्रज्वलित कर मैं  शास्त्रार्थ के लिए प्रस्तुत हो जाऊँगा। इस पर कृष्ण गन्धवह ने कोई आपत्ति नहीं जताई।  तब मुनिवर काली हवा ने विचार किया, ये व्यक्ति शास्त्रों के अध्यन में पूर्णत:  निष्णात है  अतः शास्त्रार्थ निरर्थक है यह तो पलक झपकते ही ऐसे प्रश्न करेगा जिनका उत्तर मैं न दे सकूंगा।  परन्तु जिस तरह इसने हिंसक पशुओं के डर से सैनिकों की टुकड़ी स्वीकार कर ली इस से प्रत्यक्ष है की इसमें राइ भर तप का अंश नहीं।  यह विचार करते ही मुनिवर के मानस में एक योजना का स्वरुप उत्पन्न हुआ।  इसके बाद मुनिवर निश्छंद हो अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए।  वन में उपलब्ध जड़ मूल और फलों को एकत्रित और उसमें भांगडू के पत्तों  को पीस एक उत्तेजक भोजन  की व्यवस्था कर दी।  गहन तप के आभाव में भोजन उपरांत कृष्ण गन्धवह गहरी नींद सो गया।

प्रातः मुनिवर काली हवा स्नान कर लौटे तब  कृष्ण गन्धवह को कहा की वह भी  नित्यक्रिया से निपट ले और नदी मे स्नान कर ले, तब तक वे जलपान का प्रबंध कर लेंगें।  कृष्ण गन्धवह  चपलता से उठ खड़ा हुआ और नदी तट की ओर निकल गया।   बहुत देर होने पर भी जब वह नहीं लौटा तो उसकी खोज में मुनिवर  निकल गए।  उन्हें नदी तट पर कृष्ण गन्धवह बैठा मिला वह स्नान नहीं कर पा रहा था चूँकि नदी में एक घड़ियाल था। मुनिवर को देख घड़ियाल तुरंत ही वहां से चला गया।  यह देख कृष्ण गन्धवह चकित सा रह गया।  उसने पूछा, ये घड़ियाल आप को देख यहां से कैसे भाग गया ?

मुनिवर , कुजाण।  मैं जब भी स्नान को आता हूँ यह मुझ से दूरी बनाये रखता है।  संभव है इतने वर्षों की तपस्या से यह मेरे ताप तो सह नहीं पाता। पहली बार कृष्ण गन्धवह को अनुभूति हुई की  ज्ञान के अतिरिक्त भी विधाएँ हैं और उनका जीवन में  उपयोग है ।  फिर उसने स्नान किया और दोनों कुटी की और लौट आये।  जलपान बाद मुनिवर ने कहा, अब मैं शास्त्रार्थ को प्रस्तुत हूँ।  परन्तु एक समस्या है।  आखिर हमारे बीच होने वाले शास्त्रार्थ का संचालक, मध्यस्थ  कौन   होगा ? मैं एक अनुभवी और परम विद्वान भील को जनता हूँ जो नदी के उस पार  रहता है।  चाहो तो धै लगा कर उसे बुला लूँ। गन्धवह ने कोई आपत्ति नहीं जताई।  तब मुनिवर ने मोनू भील को धै लगाई।  कुछ देर बाद मोनू लंगोटा लगाए और सिर पर पक्षियों के पंख  बांधे  वहां प्रस्तुत हुआ। मुनिवर ने उसके पाँव धोये, चन्दन लगा कर उसे आदरपूर्वक प्रज्ज्वलित दीपक के समक्ष बैठाया और गन्धवह को भी कहा की वह मोनू भील के पांव धोये , चन्दन  लगाए।  गन्धवह ने ऐसा करने से इंकार कर दिया, कहा , मैं तुंडकेतु मुनि के उच्च कुल से हूँ और यह नीच वनवासी है मैं कैसे इसके पाँव धो सकता हूँ।        

कैसी बात करते हो गन्धवह , ये व्यक्ति इस समय शास्त्रार्थ  का संचालक है हमारा मध्यस्थ अतः इस समय इसकी गरिमा देखी जाएगी न कि इसकी जात।  

तब मोनू भील ने घोर गंभीर वाणी में कहा,  "मुनिवर काली हवा, आप व्यर्थ ही इस अज्ञानी अहंकारी को अचार संहिता का पाठ पढ़ा रहे हो।  इसने शास्त्रों का ज्ञान तो अर्जित किया पर आत्मसात कदाचित ही किया है।  

क्या ChatGPT, Google और अन्य AI engine ज्ञान से अपूर्व नहीं हैं ? तो उन्हें ज्ञान की अनुभूति भी है या वे सिर्फ 0 और 1 को इधर से उधर कर संयोजित कर रहे हैं।  क्या इन AI engines को ब्रह्म ज्ञान हो गया है ?  कहने का अर्थ है की ये अबोध अहंकारी कृष्ण गन्धवह मात्र ज्ञान का बोझ उठा रहा है , तर्क वितर्क में उत्तम है परन्तु ज्ञान के चरम  बिंदु तक इसकी पहुँच है ही नहीं। ब्रह्म ज्ञान के लिए माया का पर्दा उठाना होता है और अहंकार ही माया है अन्यथा सम्पूर्ण  शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ है । 

कृष्ण गन्धवह, तुम पूर्व जन्मों में में पांच बार यह ज्ञान प्राप्त कर चुके हो परन्तु मोक्ष को प्राप्त नहीं  हुए क्योंकि तुमने ज्ञान आत्मसात किया ही नहीं।  मुनिवर काली हवा कोई और नहीं स्वयं तुम ही बोधिसत्व रूप में हो और अधूरे  हो। 

जाओ, ज्ञान को प्राप्त हो ज्ञान संचित मत करो।  


Saturday, February 22, 2025

दैत्य का उद्धार

 प्राचीन काल में वितस्ता नदी के तट पर ऋषिवर मुंडकेश्वर, 5000 गाय सहित, एक  विशाल आश्रम में रहते थे । अनेक ऋषि और सैकड़ों विद्यार्थी वहां  रह कर तप और अध्ययन करते थे।  प्रायः यज्ञ का आयोजन कर इंद्र एवं अन्य देवों को प्रसन्न किया जाता था। देवों की प्रसन्नतावश सब सुचारु चल रहा था न अत्यधिक वर्ष होती थी न ही सरिता में आप्लव होता न अकाल पड़ता था। 5000 गौओं के कारण  दूध और धृत की कमी न थी।  सब कुछ ठीक चल रहा थी की आपदा आ पहुंची।  पास के जंगल में तमवात नाम का दैत्य आ पहुंचा और यज्ञ में विघ्न डालने लगा , गौवें उठा कर ले जाता।  जब तमवात का उत्पात सीमा से बहार हो गया तब ऋषिवर मुन्डेक्श्वर ने "रज्जुप्रग्रहम" यज्ञ  का आयोजन किया। दो दिवस तक प्रचंड मंत्रोचारण उपरान्त अश्विनीकुमारों  को  प्रकट होना पड़ा। तब ऋषिवर मुंडकेश्वर ने 1000 नामों से अश्विनों की वंदना की जिससे वे प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा।  ऋषिवर ने तमवात को रस्सी से जकड कर प्रस्तुत करने को कहा।  तथास्तु कह अश्विन अंतर्ध्यान हो गए।     

कुछ ही क्षणों में महाकाय तमवात यज्ञ शाला के पास पड़ा था।  तब बंधन जकड़े तमवात ने कहा, 'मुनिवर आप महान तपस्वी हो, यज्ञ के ताप से मैं यहां बंधन में जकड़ा हुआ हूँ, मेरा क्या दोष है और आप मेरा क्या करेंगे?

मुनिवर, 'तमवात, तुमने अकारण ही यहां यज्ञ में विघ्न डाला और गौओं को उठा कर ले गए , ये तुम्हारा अपराध है।  तुम्हें श्राप देकर मैं तुम्हें व्याघ्र योनि में डाल दूंगा। '

'परन्तु मुनिवर मैं दैत्य हूँ, उत्पात करना मेरा स्वाभाव है और गौ मेरा भोजन, ये कैसा अपराध? अतिरिक्त, अगर आप मुझे श्राप  देंगे तो आपके दस वर्षों के तप की ऊर्जा का ह्रास होगा और आप इस आश्रम में सभी ऋषियों के गुरु नहीं रह पाएंगे।'

'क्यों न हम शास्त्रार्थ करें, पराजित होने पर मैं स्वयं इस अरण्य से चला जाऊँगा।'
'तुम दैत्य हो तुमसे शास्त्रार्थ वर्जित है। '
'आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः' यह वेद वाक्य है इस दृष्टि से मेरे दैत्य होने पर भी आप मुझ से ज्ञान अर्जित कर सकते हैं अतः मुझ से शास्त्रार्थ पूर्णतः शास्त्र संगत है।'   
अस्तु  ! मैं तुमसे शास्त्रार्थ को प्रस्तुत हूँ।       

मुनिवर की स्वीकृति होते ही, छात्रों ने यज्ञशाला के समीप की भूमि साफ़ कर दी और जल का छिड़काव किया। इसके मध्य एक चौकोर वेदी बनाई गई, फूलों से सज्जित कर दीप प्रज्ज्वलित कर दिया। धुप की सुगंध वातावरण में आच्छादित हो गई।  दो मृगछाला  वेदी के दोनों तरफ बिछा दी गई। पांच वरिष्ठ ऋषि निर्णायक की भूमिका में तत्पर हो मृगछालाओं के सम्मुख बैठ गए। मुनिवर मुंडकेश्वर ने भी एक तरफ बिछी मृच्छाला पर आसान ग्रहण किया। तब उन्होंने अपने सबसे उद्धण्ड शिष्य भास्कर से कहा, 'आदरणीय तमवात के पैर धोएं।  

भास्कर, 'परन्तु, मुनिवर ये तो दैत्य है ?'
मुनिवर, 'नहीं, शास्त्रार्थ को प्रस्तुत व्यक्ति पूजनीय है। '

मनमसोस कर  उद्धण्ड भास्कर को तमवाप के पैर धोने पड़े। तब मुनिवर ने एक अन्य अनाज्ञाकारी शिष्य, आनंदकर को तमवाप को चन्दन का तिलक लगाने को कहा।  कर्मकांडी और दकियानूसी आनंदकर ने भी नाकभौं सिकोड़ कर तमवाप को चन्दन का तिलक लेप किया। मुनिवर ने आनंदकर को फटकार लगायी, अनिच्छा से कार्य नहीं करना चाहिए। 

निर्णायक मंडली ने निश्चय किया चूँकि, तमवाप ने शास्त्रार्थ की चुनौती दी अतः, प्रश्न का प्रारम्भ मुनिवर मुंडकेश्वर करेंगे। 

शास्त्रार्थ :

मुंडकेश्वर : "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" बल किले ब्वाल ?
तमवाप :  स्या सूत्र बादरायण रचित ब्रह्मसूत्र का पहला सूत्र है। शब्दार्थ तो 'अब हम ब्रह्म जिज्ञासा करें' परन्तु गूढ़ अर्थ; ब्रह्म पूर्ण है, समस्त है, सर्व व्याप्त है, निर्गुण है हर आयाम , हर वस्तु, हर जीव का मूल है स्रोत है  अतः उसकी जिज्ञासा अनिवार्य है। 
मुंडकेश्वर : साधु !साधु !

तमवाप :  विष्णु क्या है , जीवात्मा या परमात्मा ?
मुंडकेश्वर : विष्णु परमेश्वर है, जगत का संरक्षक, पालन कर्ता  है।   
तमवाप : परन्तु जीवात्मा है कि परमात्मा है ?
मुंडकेश्वर : विष्णु स्वयं ब्रह्म है, परमात्मा है।  
तमवाप : अगर विष्णु स्वयं ब्रह्म है तो उस दृष्टि से हम सभी ब्रह्म हैं "अहं ब्रह्मास्मि" विष्णु में विशेष क्या है ।  वह भी कर्म करता है, दस्युओं का वध करता है,  भक्तों, ऋषियों  को संरक्षण प्रदान करता है। ये कर्म है और इसका कर्मफल होगा तो कर्मफल का भोग कौन करेगा। 
मुंडकेश्वर :  ईश्वर कर्मफल से परे है वह पूर्ण ब्रह्म है । 
तमवाप :  अगर ईश्वर पूर्ण ब्रह्म है तो वह मोक्ष प्राप्त है फिर सगुण क्यों, कर्म क्यों ? कर्म वो करता है जो किसी योनि में जीव है , ईश्वर की क्या योनि है ? कर्म करने वाला वह पूर्ण ब्रह्म नहीं हो सकता। 
मुंडकेश्वर :   ईश्वर की कोई योनि नहीं , मैं बार बार कह  रहा हूँ की वह स्वयं ब्रह्म है। 
तमवाप : आप जो कह रहे हैं उसमें घोर विरोधाभास है। पूर्ण ब्रह्म मोक्ष से प्राप्त होता है।  मोक्ष के पर्यन्त अहम का नाश हो जाता है, जीव भावहीन, मोहहीन, विरक्त महाब्रह्म में विलीन हो जाता है। कर्म के लिया माया मोह भाव आवश्यक है अतः विष्णु पूर्ण ब्रह्म नहीं है।  फिर वह किस योनि में स्थापित  है?
मुंडकेश्वर :  मुझे नहीं पता। 

यह कह कर मुंडकेश्वर ने दीपक बुझा अपनी हार स्वीकार कर ली। 

अब निर्णायकगण ऋषि परामर्श करने लगे।  कुछ समय पश्चात वरिष्ठ निर्णायक मुनि ने तमवात की तरफ दृष्टि डाली, कहने लगे, 'हे तमवात, पूर्व में श्रावस्ती नगर में ममता नाम की परम विदुषी का निवास था।  किसी भी समस्या का तर्कसंगत समाधान  उसके पास था।  नगर के धनपति,  राजनितिक अधिकारी, कोतवाल और साधारण नागरिक, सभी उसके पास परामर्श के लिए आते थे।  उसकी ख्याति नगर के पर्यन्त भी फैली हुई थी।  एक बार वेद तिमिरम नाम का श्रेष्ठि उसके पास आया और कहने लगा, देवी आप परम विद्वान हैं अतः यदि मैं आपके प्रश्न का उत्तर न दे सका तो आपको 10 स्वर्ण मुद्रा दूंगा परन्तु यदि आप मेरे प्रश्न का उत्तर न दे सकी तो आपको मुझे 100 स्वर्ण मुद्रा देनी होंगी।  देवी ममता इसके लिए सहर्ष मान गयी।  तब श्रेष्ठि ने प्रश्न किया , 'ऐसा कौन सा जीव है जो तीन पैर से चलता है, उसके दो मुख हैं और एक छलांग में हिमालय चढ़ जाता है ?
देवी ममता हतप्रभ रह गयी, बहुत विचार बाद उसने 100 स्वर्ण मुद्रा वेद तिमिरम को दे दी।  फिर पूछा, ऐसा कौन सा जीव है ?
अब बेहया वेद ने अपनी झोली से 10 स्वर्ण मुद्रा निकाल कर  देवी ममता को प्रस्तुत कर दी और कहा मुझे भी नहीं पता और अपनी राह चला गया। 

तमवात, हमारा निर्णय है के यदि तुमने अपने प्रश्न का तर्कसंगत और संतोषजनक उत्तर दिया नहीं दिया तो तुम्हें शास्त्रार्थ का विजेता नहीं घोसित किया जाएगा। 

तमवात : अवश्य मुनिवर। आपकी आशंका निराधार नहीं।  मैं पूरी चेष्टा करूंगा की मेरा उत्तर आप लोगों को संतुष्ट कर दे। अस्तु !

विष्णु कौन है? विष्णु , द्रव्यमान रहित, अमूर्त तरंगित माया हैं।  जिस तरह 'विचार' का द्रव्यमान नहीं होता, अमूर्त होता है फिर भी जीव को प्रभावित करता है उसी तरह माया भी अमूर्त है उसका स्वरुप नहीं परन्तु वह जीव को प्रभावित करती है।  माया कर्म और कर्म फल से परे है , न वह जीवात्मा है न परमात्मा है वह छलावा है, मृगमरीचिका।  विष्णु माया ही हैं। 

मुनिगण : साधु !साधु ! अंत्यंत हर्ष से हम घोषणा करते हैं के तमवात शास्त्रार्थ में विजयी रहे। 

उसी समय व्योम में मेघ आंदोलित हो उठे, भीषण गड़गड़ाहट से चपला चमत्कृत करने लगी और फिर आकाशवाणी हुई ,

"तमवात , तुम श्राप मुक्त हो गए हो , अपने मूल रूप काली हवा को प्राप्त हो जाओगे। "

उसी क्षण तमवात में परिवर्तन हुआ , उस स्थान पर स्नीकर्स, जीन्स और टी-शर्ट पहने  टकला व्यक्ति खड़ा था।  काली हवा !             

इति कथा।









कृष्ण गन्धवह

 प्राचीन काल में  त्रिस्ता नदी के तट ऋषिवर तुंडकेतु का आश्रम था। तुंडकेतु की छत्रछाया में अनेक ऋषि और विद्यार्थी श्रमपूर्वक अध्यन और तप कर रहे थे।  कालांतर में तुंडकेतु का एक प्रतिभाशाली तेजस्वि पुत्र हुआ। ऋषिवर ने पुत्र का नाम  कृष्ण गन्धवह रखा।  पुत्र अत्यंत ही मेधावी था। चार वर्ष का होते होते उसने सभी वेदों में पारंगता प्राप्त कर ली थी; छह वर्ष होते होते वह वेदांत में भी पारंगत हो गया और शास्त्ररार्थ में अपने से कई वर्ष वरिष्ठ विद्यार्थियों और ऋषियों को परास्त करने लगा। 

सात वर्ष का होते होते आश्रम में तुंडकेतु के अतिरिक्त कोई भी  ऐसा नहीं था जो उस के साथ शास्त्ररार्थ कर सके।  अब गन्धवह सभी को 'वत्स' कह कर पुकारने लगा। पहले तो सबने इसे हंसी में टाल दिया पर जब गन्धवह अपने व्यवहार से विचलित  नहीं हुआ तो सभी आश्रम में रहने वाले ऋषियों ने तुंडकेतु से इस बात का आक्षेप लगाया कि गन्धवह उन सभी को वत्स कह कर उनकी अवहेलना करता है अपमान करता  है।  यह सुनकर तुंडकेतु चकित रह गए, गन्धवह के  व्यवहार से पीड़ित हो गए।  तब उन्होंने गन्धवह को बुलाया और अपने व्यवहार का कारन बताने को कहा।  तब गन्धवह ने कहा :

वरिष्ठः जन्मना न भवति, ज्ञानेन भवति।
ज्ञानं प्रदाता शिष्येभ्यः वरिष्ठः। 

(Seniority is not by birth but by knowledge. The one who imparts knowledge is senior)


विक्रम और वेताल

 हठी विक्रमार्क ने वृक्ष से शव उतरा, कंधे पर रख चुप चाप शमशान की तरफ चलने लगा। तब उस शव में स्थित वेताल ने कहा, 'विक्रम,  मैं तुम्हारे अदम्य साहस की प्रशंसा करता हूँ।  रास्ता लम्बा है और थकाऊ अतः थकान दूर करने की लिए तुम्हे एक कथा सुनाता हूँ। 

प्राचीन ताम्रलिप्ति में एक वणिक चंद्र बडोला रहता था। चूँकि ताम्रलिप्ति एक बड़ा समुद्र पट्टन था; जावा, सुमात्रा श्याम इत्यादि देशों से सामान से लदे बेडों का आना जान लगा रहता था  अतः उसका व्यवसाय अच्छा फलफूल रहा था।  परन्तु बडोला को द्यूत, अक्षक्रीड़ा की लत थी।  एक बार आनंद नाम का धूर्त  बडोला को नगर नर्तकी अम्बशोभा के महल ले गया जहाँ नृत्य के साथ द्यूत भी खेला जाता था।  अम्बशोभा के महल में आनंद काने ने पहले ही अपने मित्र अशोक चाकू और भास्कर बन्दूक को बुला रखा था।  तीनों ने मिल कर चंद्र बडोला को भरपूर मद्यपान कराया, जब वह होश में नहीं रहा तब उसे काली हवा के समुद्री बेड़े में फेंक दिया।  काली हवा का समुद्री बेड़ा सुमात्रा, जावा हो कर बाली जाने वाला था। इधर बेसुध बडोला, जलयान के उस खोंचे में पड़ा था जहां लाख, ताम्बे और चांदी बने हज़ारों गहने व्यापार के लिए रखे थे। उधर इन तीनों धूर्तों ने बडोला के व्यवसाय पर क़बज़ा कर लिया।  अगले दिन जब बडोला को होश आया तब वह अचंभित रह गया, अपने को लाख के बने खिलौनों और गहनों के ढेर पड़ा पा वह किंकर्तव्यविमूढ़ रह गया साथ ही डोलते लकड़ी के भंडार से उसे आभास हो गया की वह तो किसी व्यापारी बेड़े में है।  किसी तरह उसने शोर मचा कर नाविकों का ध्यान आकर्षित किया।  कपाट के खुलने पर नाविक भी अचरज में आ गए के ये कौन आगंतुक है और कैसे पोत में  आ गया।  व्यापारी काली हवा को खबर मिली के एक अनजान व्यक्ति भंडार गृह में पाया गया। पहले तो वह आगबबूला  हो उठा, फौरी तौर पर उसने कहा उस अनजान व्यक्ति को समुद्र में फेंक दिया जाय क्योंकि एक अनावश्यक व्यक्ति यात्रा में बोझ था पर फिर विचार कर उसने उस अनजान व्यक्ति को प्रस्तुत करने को कहा। बडोला प्रस्तुत होने पर काली हवा ने कहा, 'तुम कौन हो जलपोत पर कैसे? यदि तुम इसका समुचित कारण न बता सके तो तुम्हें समुद्र में फेंक देंगे। '

बडोला की सिटी पिट्टी गम हो गई, घिघियाते हुआ उसने अपने कहानी बताई फिर कहा वह इस यात्रा में जो कुछ भी उसे कार्य दिया जायेगा वह निष्ठा से करेगा और लौटने पर काली हवा को 100 स्वर्ण मुद्रा भी देगा।  

तब काली हवा अपने निजी पुरोहित, शुभाकर को बुलाया और पूछा की क्या बडोला सच बोल रहा है?

तब शुभाकर ने बडोला की हथेली देख कर कहा, 'ये निश्चित है के व्यक्ति ठग नहीं है। '

तत्पश्चात काली हवा ने बडोला को रसोइये का सहायक नियुक्त कर दिया और भुज्जी काटने, भाड़ा बर्तन धोना इत्यादि का उत्तरदायित्त्व सौंप दिया।  इसके अतिरिक्त, चूँकि बडोला पढ़ लिख सकता था और हिसाब लगाना आता था अतः उसे जलपोत की लॉगबुक एंट्री करना, विभिन्न पट्टन का विवरण, व्यापर की बही वगैरह को अप टू डेट रखना वगैरह कार्य भी उसी के हवाले कर दिया। 

इधर ताम्रलिप्ति में आनंद 'काना', अशोक 'चाकू' और भास्कर 'बन्दूक' ने चंद्र बडोला के अड्डे पर धावा बोल दिया पर उन्हें वहां कुछ न मिला। एक पुस्तिका मिली जिसमें   गुप्त संकेतों में उनके लोगों के नाम थे जिनसे बडोला को पैसे वसूलने थे, मात्रा 5 मुद्राएं, कुछ सौ कौड़ियां और दमड़ी मिली।  इन तीनों ग्याडूओं को व्यापार का कुछ भी ज्ञान न था अतः अड्डे में पड़ी सामग्री औने-पौने दामों में बेच दी।  जो पैसा मिला रात, अम्बशोभा के महल में मद्यपान और द्यूत में गँवा दिया। 'काने' ने देखा केवल तीन स्वर्ण मुद्रा बची थी उसने मटके में भरे पानी में विष घोल दिया। जब 'चाकू' और 'बन्दूक'  सुबह उठे तो रात मद्यपान के कारण dehydrated थे दोनों ने छक कर पानी पिया। देखते देखते 'चाकू' और 'बन्दूक' ने गाला पकड़ लिया, बात समझने में देर न लगी तब 'चाकू' ने चाकू फ़ेंक कर 'काने' पर प्रहार किया साथ ही साथ  'बंदूक' ने तमंचा निशाने पर दाग़ दिया।  मृत्यु के बाद तीनों ही पिशाच योनि को प्राप्त हुए।  

उधर बडोला निष्ठापूर्वक कार्य करता रहा, बाली पहुँचने पर काली हवा ने प्रसन्न हो कर उसे १०० स्वर्ण मुद्राएं दी साथ ही सभी बचे हुए लाख, ताम्बे और चांदी के गहने उसे दे कर वहीं व्यापार करने का परामर्श दिया जिसे बडोला ने सहर्ष स्वीकार कर लिए।  परन्तु उसके ह्रदय में बदले की भावना आग की तरह सुलग  रही थी। 

दो वर्ष हुए बडोला ने मेहनत और कौशल से बाली में अच्छा व्यापर खड़ा कर लिया परन्तु ताम्रलिप्ति में जो हुआ उसको वह भुला न पाया। अपना प्रतिष्ठान अच्छे लाभ पर बेच कर वह लौटने को प्रस्तुत हुआ।  ताम्रलिप्ति लौटने पर वह अच्चम्भित रह गया।  उसके पूर्व में व्यवस्थित व्यापार का भट्टा बैठा था,  भवन जहाँ से उसका व्यापार चलता था, खंडहर बना हुआ था परन्तु सबसे दुःखदायी दृश्य  भवन के सामने बरगद वृक्ष के नीचे उसने देखा कि उसकी पत्नी , कलिण मीनाक्षी देवी और बेटी भीख मांग रहे थे।  वह क्रोधित हो उठा और कलिण मीनाक्षी को फटकार लगाई के वह भीख क्यों मांग रही है। उसने 1000 स्वर्ण मुद्राएं उसी बरगद के नीचे एक कलश में भर गाड़ रखी थी और ये बात  कलिण मीनाक्षी को कई बार बताई थी।  कलिण मीनाक्षी भी तैश में आ गई और कहने लगी। अचानक ही उसके लापता होने से वह किंकजर्तव्यविमूढ़ हो गई थी, जो कुछ घर में था उससे जितने दिन चल सका चला फिर भीख के अतिरिक्त कोई गुज़ारा न था।  जो हुआ सो हुआ, कह बडोला ने फिर से भवन की मरम्मत करवाई और अपना पुराना व्यापार फिर से खड़ा कर लिया।  इस बात की उसे घोर निराशा थी के वे तीनों आतताई मृत्यु के ग्रास हो चुके थे जिनसे बदला लेने की भावना उसके ह्रदय में प्रज्ज्वलित थी।  

कुछ दिन उपरांत नयी समस्या खड़ी हो गई उसके निवास पर प्रेतों का उत्पात प्रारम्भ हो गया। बर्तन डोलने लगते, चारपाई अपनी जगह से दूसरी जगह मिलती, भात डोंगे से बहार भूमि पर गिरा मिलता। बडोला परिवार परेशान हो गया। तब उसने ओझा वेद 'निर्भगी' को बुलाया और समस्या का निदान करने की उपाय सुझाने को कहा। 'निर्भगी' ने झाड़ू, छिपकली, चमगादड़ और शमशान की राख लाने को कहा। बडोला ने अपने सहायक ओम 'गूंगा' को पैसे दे कर सब सामान की व्यवस्था कर दी।   'निर्भगी' ने रात 12 बजे अग्नि जला कर डोंगे में छिपकली और चमगादड़ पकाया , राख की छौंक लगाई , झाड़ू से मिक्स कर एक कुल्हड़ भर पी लिया।  फिर क्या था कुछ ही देर में  'निर्भगी' दृश्यहीन हो गया।  कोलाहल होने लगा, अदृश्य जगत में थप्पड़, चांटे के आवाज़ें गूँज रही थी। फिर सब शांत हो गया।  कुछ ही देर बाद  'निर्भगी' मूर्छित अवस्था में वहां दृश्यगत हुआ।  होश में आने पर उसने बताया कि बडोला निवास पर 'काना', 'चाक़ू' और 'बन्दूक' पिशाचों का प्रकोप है।  वे तीनों ही पिशाच योनि में तब तक रहेंगे जब तक उनका विधिवत दाह संस्कार न होगा।  

यह कह कर वेताल रुक गया, कहने लगा, 'विक्रमार्क बडोला की दुविधा देखो, एक तरफ वह इन तीनों दुष्टात्माओं को दण्डित करना चाहता है दूसरी तरफ स्वयं एवं परिवार की शांति , उसे इन दोनों अवस्थाओं में से एक को चुनना है? तुम बताओ कौन सा मार्ग तर्कसंगत है।  यदि जानते हुए भी तुम उत्तर न दिया तो तेरे मुंड के टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे।  


Friday, June 07, 2024

बोधिसत्त्व : श्रावस्ती पर एक और कथा

 प्राचीन नगर श्रावस्ती वाणिज्य का प्रमुख केंद्र था, हर तरह कि वस्तुओं के बाजार (हिन्दी शब्द क्या है- हाट ?) थे, श्रमणों, व्यापारियों, कलाकारों, विचारकों इत्यादि का आना जाना लगा रहता था। नृत्य, संगीत की सभाएं और दर्शन पर वाद-विवाद होते रहते थे। पश्चिम दिशा से आने वालों को नगर के प्रवेश से पहले एक गहन जंगल पार करना पड़ता था जहां हिंसक जानवर और डाकुओं का भय रहता था। नगर में काली हवा नाम का अकिंचन व्यक्ति रहता था । दरिद्रता से काली हवा का संसार से मोहभंग हो गया अतएव नगर से उक्ता कर वह वानप्रस्थ के लिए तत्पर हो गया। कपाल के केश और दाढ़ी बढ़ जाने से वह किसी मुनिवर कि तरह प्रतीत होते थे। एक पोटली में कुछ अति आवश्यक वस्तुएं, ईश्वर की सूक्ष्म मूर्ति, अगरबत्ती इत्यादि लेकर वह पश्चिम दिशा को प्रस्थान कर गए। 

नगर प्राचीर पर्यंत ही जंगल प्रारंभ हो गया। ज्यों ज्यों वह बढ़ते गए जंगल गहन होता गया। साँझ होने तक वे थक कर निढाल हो गया परंतु प्रसन्नता कि बात थी के उन्हें वहाँ एक कल कल निरझर जल से बहता नाला दिखा और पास ही विशाल वृक्ष। आस पास हर प्रकार के जंगली फलों के वृक्ष थे साथ ही काली हवा को जड़ी बूटी का भी ज्ञान था अतः यह स्थान ध्यान के लिए उपयुक्त है सोच कर उन्होंने विचार किया यहीं रुक जाता हूँ । 

इस बात से पूर्णतः अनजान के यह विशाल तरु एक विस्तृत वानर परिवार का आवास है, उसने तने के समीप एक भूभाग को साफ किया और वहीं चादर बिछा कर सो गया। वानरों का मुखिया, सुमंत नाम का बलिष्ठ वानर था, सुमंत ही बोधिसत्त्व था। वानर स्वभाव से ही चंचल होते हैं अतः उस वृक्ष के नीचे एक सर्वथा अपरिचित व्यक्ति को देख अचरज में पड़ गए। प्रातः होते ही उन्होंने काली हवा पर अधखाए फल, गुठलियाँ फेंकना प्रारंभ कर दिया। काली हवा ने अपने ऊपर गिरती गुठलियाँ इत्यादि देख कर चहुं ओर दृष्टि डाली, वानरों को देख अपनी परिस्थिति की नाजुकता का एहसास हुआ। उसने सोच ये वानर कुछ देर शरारत करेंगे फिर अपने रास्ते चल देंगें। अतः वानरों पर अधिक समय नष्ट करना मूर्खता होगी सोच कर उन्हें अनदेखा करने का विचार किया। इस तरह कुछ दिन बीत गया, वह सुबह उठ कर प्रतिदिन नित्य क्रिया से निपट कर स्नान करता, कंद मूल ढूंढ कर क्षुधा शांत करता और ध्यान पर बैठ जाता। उधर वानरों को उसका अपने निवास का अतिक्रमण बिल्कुल भी पसंद नहीं आया उन्हें विचार था कि यह साधु एक दो दिन बाद चला जाएगा लेकिन जब नहीं गया तो उनका उत्पात और बढ़ गया। सुमंत ने अपने साथियों को समझने कि कोशिश की कि साधु को अपने हाल पर छोड़ दो, उसके वहाँ रहने से वानरों को कुछ भी अंतर नहीं पड़ता, लेकिन वह जानता था उसका परामर्श व्यर्थ है, वह वानरों का स्वभाव नहीं बदल सकता। सप्ताह भर बाद टकराव कि स्थति या गई, काली हवा समझ गया के ये वानर जाने वाले नहीं और वानरों का उसे निष्कासित करने निश्चय भी नहीं डिगा। उधर सुमंत किसी अनहोनी के संशय में पड़ गया। अगली सुबह काली हवा ने ध्यान लगाने का विचार त्याग दिया तभी उसे एक उपाय सूझा, वह जंगल से कुछ पत्तियां, जड़ी और फूल लेकर लौटा, जड़ी पीस कर उसने लाल रंग बनाया, ईश्वर कि मूर्ति स्थापित कर चारों तरफ लाल रंग कि रंगोली बनाई, फूल मूर्ति पर चढ़ाए, पत्ते अपने जल भरे लोटे में डाल दिए। सभी वानर उसका यह नया क्रिया कलाप अचरज से देख रहे थे। उसने अगर बत्ती जलाई, उसकी सुगंध चारों दिशा फैल गई। अब वह जोर जोर से अगड़म बगड़म मंत्र पढ़ने लगा। हवा में एक तनाव कि स्थति पैदा हो गई, वानर किसी गंभीर संभावना के डर शांत हो गए। जब वह संतुष्ट हो गया कि समुचित तनाव पैदा हो गया है, तब उसने मूर्ति के सामने रखी लकड़ी उठाई उसका छोर लाल रंग से निपोड़ दिया और खड़ा हो गया । लकड़ी को उसने बंदूक कि तरह तान दिया और वानरों पर घूम घूम कर निशाना लगाने लगा जब लकड़ी सबसे पास के वानर पर तनी, वह रुक गया। हाथ में रखे लाल रंग को उसने पास के वानर पर फेंकते हुए, हथेली कि तीन उँगलियाँ उठाई और मेघ कि तरह गरजते हुए कहा, तीन दिन में तेरा काल निश्चित है। वानर जो अब तक स्तब्ध उसका उपक्रम देख रहे थे अब अलग अलग गुटों में बंट गए और दिनों से भिन्न, दबी उत्तेजना में बातें करने लगे लेकिन वह वानर जिसे काली हवा ने तीन दिन में काल ग्रसित होने का दावा किया था, अकेला, शांत बैठा   दिखा। सुमंत शीघ्र ही पाखंडी काली हवा का प्रपंच समझ गया, उसने व्यथित वानर को समझाने का अथक प्रयास किया लेकिन कोई सफलता नहीं मिली । इंगित वानर ने उसी समय खाना पीना छोड़ दिया, किसी भी क्रिया कलाप में हिस्सा नहीं लिया। उसकी दशा देख सुमंत बहुत चिंतित हो गया। अगले दिन ही वह वानर बीमार पड़ गया, उसका वज़न तेज़ी से घटने लगा। वानर अब काली हवा से दूर ही रहे कोई पास फटकने का साहस न कर सका। 

दूसरे दिन सुमंत काली हवा के सामने बैठ गया, कहने लगा, ‘हे काली हवा, मेरा नाम सुमंत है और मैं इन वानरों का अधिपति हूँ। मैं जानता हूँ जो तुमने किया वह पूर्णतः ढोंग था लेकिन ये भी ठीक है के वानरों का तुम पर उत्पात भी अनुचित था। अब जब, वानर तुम से दूर रहते हैं अतः तुमसे आग्रह है के उस वानर के प्राण न लो।‘

काली हवा: हे सुमंत, तुम ज्ञानी प्रतीत होते हो क्यों नहीं उस वानर को समझाते कि जो मैंने किया वह ढोंग था?

सुमंत : इसके दो कारण हैं। पहला तो ये कि अगर वह वानर इस बात से आश्वस्त हो जाए कि तुम्हारा किया आयोजन ढोंग था तो वानर फिर से उत्पात शुरू कर देंगे और मैं नहीं चाहता हमारे बीच कोई टकराव रहे, दूसरा कारण है कि उस वानर को आश्वस्त करना संभव नहीं । मेरा अनुग्रह  है के तुम फिर उसी तरह का चकाचौंध करने वाला तंत्र करो और दिखाओ के तुमने अपना श्राप वापस ले लिया है नहीं तो उस वानर कि मृत्यु निश्चित  है। 

काली हवा: सुमंत तुम सचमुच परम ज्ञानी हो, अत्यंत ही सुलझे मानस के स्वामी। उस वानर से कहो कल प्रातः ही मैं उसका श्राप वापस ले लूँगा।

अगले दिन सुबह सुमंत, श्रापित वानर को लेकर काली हवा के समक्ष प्रस्तुत हो गया तब काली हवा ने उस वानर से कहा, तुम नदी में स्नान करो फिर जंगल से एक सफेद पुष्प लेकर आओ, ध्यान रहे पुष्प पूर्ण हो कहीं कोई दोष न हो। तब काली हवा ने पहले कि तरह मूर्ति स्थापित की, फूलों से सज्जित कि और आम्र पत्र लोटे में भरे जल में डूबा दिए, अगरबत्ती जल दी। वानर के समक्ष वह वही अगड़म बगड़म मंत्र ज़ोरों से पढ़ने लगा, बार बार आम्र पत्रों से जल वानर पर छिड़कने लगा। अंततः  लकड़ी का छोर लाल रंग में लपोड़ा और इस बार लकड़ी की दिशा अपनी तरफ कर मुट्ठी भींच अपनी तरफ खींचते मानो किसी अदृश्य अस्त्र को खींच रहा हो, चिंघाड़ा , "दत्तः शापः प्रत्यर्पितो भवेत्" । फिर उसने मुंह से लाल रंग उगल दिया और जमीन पर मूर्छित गिर गया। सुमंत ने उसके मुख पर लोटे का जल छिड़क उसे उठाया, अब काली हवा प्रसन्न मुख से बोल, ‘जा अब तेरा कुछ नहीं होगा।‘ इस इस अतिरंजित स्वांग का समुचित प्रभाव पड़ा, श्रापित वानर अब आश्वस्त दिखा, एक राहत का असर मुख पर साफ दिखा। 

वहाँ से निकाल कर सुमंत ने अपने समूह से कहा, जब तक ये साधु यहाँ है हमें कहीं और चले जाना चाहिए, न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।   

वानर प्रकरण इति !!



Tuesday, June 04, 2024

एक अप्रत्याशित याद

 इंसान बाज़-औक़ात शर्मिंदा हो जाता है ऐसी बातों से जिसमें उसका कोई कसूर नहीं होता मसलन लोग अपनी ग़रीबी पर ही शर्मिंदा महसूस करते हैं जब कोई अमीर दोस्त या रिस्तेदार उनसे मिलने उसके घर चले आते हैं। वह हर कोशिश करता है घर को चमकाने में, उन चीज़ों को ढँक देने में जो उसकी पसमांदगी को नुमाया करे। ऐसा क्यों होता है, कुजाण !

जब मैं योग करता हूँ तो वह तीन मुखतालिफ़ स्टेजेस में होता है पहला हिस्सा जो के 15 से 18 मिनट का होता है, महज़ सांस लेना और छोड़ना, इस स्टेज में और कुछ भी नहीं होता, दिमाग़ ज़्यादा बड़ी संभावना के लिए तैयार होता है। दूसरा हिस्सा भी 15 से 17 मिनट का होता है और इसमें सांस लेने में तन्मयता आ जाती है और मानस गहनता में डोलता महसूस होता है अंतिम हिस्सा दूसरे हिस्से कि तरह 15 मिनट का ही होता है लेकिन कभी कभी आखरी 5 मिनट अवचेतन कि स्थिति में पहुँच जाता हूँ। आज सब करा-धरा व्यर्थ गया। तीसरी अवस्था के मध्य एक पुरानी याद उभर आई, ऐसी याद जो अपने ही प्रति ग्लानि पैदा करती है। वाक़िया बहुत पुराना है कॉलेज के वक़्त का और किसी सिलसिले में मुझे दिल्ली जाना पड़ा। उस वक़्त दिल्ली में बस एक ही ठिकाना था, स्वर्गीय चाचाजी का लोदी रोड वाला घर, 14/768; इत्तेफाक़न उस वक़्त चाचा और चाची कहीं बाहर गए हुए थे और मुझे मरहूम गुड्डू ( ब्रजेश काला) और प्रभाकर वहाँ मिले । शाम के वक़्त गुड्डू ने फरमाइश कि के बकरे गोश्त  बनाया जाए मैंने फौरन हाँ कर दी और चूंकि मैं हॉस्टल में रहता था इसलिए मेरे पास पैसे भी रहते थे। खन्ना मार्केट के आखरी छोर पर मुझे बताया गया के गोश्त मिलता है। मैं झोला लेकर निकल पड़ा।  इससे पहले मैंने गोश्त नहीं खरीद था सो जब दुकानवाले ने मुझे मांस काट कर दिया तो मुझे समझ नहीं आया के ये लाल/भूरे हिस्से क्यों दे रहा है जबकि सफेद हिस्सा खोये कि तरह दिल पज़ीर लग रहा था। मैंने कहा के सफेद वाला ही हिस्सा दो, उसने मुझे ताज्जुब से देखा और खुशी खुशी मांस हटा कर पूरा सफेदऐ वो तो आगे है  माल पकड़ा दिया। घर आ कर जब मीट गुड्डू के हवाले लिया तो उसका मुंह उतर गया, कहने लगा ये क्या ले आए इसमें तो मीट है ही नहीं सिर्फ चर्बी है। फिर दोषारोपण का दौर चला जिसमें मरहूम सर प्रभाकर ने जम कर चटकारे लिए, ‘बिंड़ी चकडैत’ जैसे शब्द हवा में उछले। बहरहाल जो क़िस्से में मीट है वह तो आगे है।

गुड्डू महाशय का उतरा मुंह देख कर मैंने पहल की कि और मीट ले आते हैं लेकिन मैंने उसी दुकान जाने से साफ मना कर दिया (वहाँ मैं क्या मुंह लेकर जाता?)। गुड्डू ने कहा एक दुकान और है जोरबाग़। मैंने कहा चलो। लेकिन पहले जोरबाग़ कि बात हो जाए । घर से पत्थर फेंकने कि दूरी पर ही ये दिल्ली का अप्टाउन इलाक़ा है, अमीरों कि बस्ती, यहाँ रहने को दड़बे नहीं, आलीशान कोठियाँ हैं और ज़ाहिर सी बात है जो दुकानें हैं वो भी उसी शक्ल में। गुड्डू ने दुकान ज़रूर देखी थी पर गया कभी नहीं था, वहाँ जा कर मुझे इशारा किया के वो दुकान है, मैंने कहा, ‘चलो’। उसने साफ इनकार कर दिया। चूंकि हमारे कॉलेज में भी शीशे के façade वाली बड़ी बड़ी imposing इमारतें थीं लिहाज मुझे ऐसी chic, मॉडर्न बिल्डिंग intimidate नहीं करती थी। लेकिन कॉलेज कि बात और है, यहाँ मामला दूसरा था। मैंने हवाई चप्पल पहनी थी और साधारण बेल-बाटम पेंट-कमीज़ जो उस दौर में अमूमन मिडल क्लास की कैजुअल पोशाक हुआ करती थी । दुकान एयर-कन्डिशंड थी, ग्लास के रैक्स में तरह तरह कि मीट से सजी प्लेटें थीं, दो अभिजात्य वर्ग कि मोहतरमा भी वहाँ मौजूद थी एक कोने में बतिया रहीं थी और खानसामा जैसी सफेद टोपी पहने और सफेद ही लिबास में दुकानदार या उसका मुलाज़िम इन racks के पीछे खड़ा था। मेरे अंदर आते ही मानो फ़ज़ा में मौजूद तवाजुम (equilibrium) बिखर गया, दोनों मोहतरमा ने यकायक ही बातचीत आधे में रोक मेरे तरफ रुख किया और इस तरह देखा जैसे मैं सर्कस से निकला कोई जोकर हूँ वही रैवय्या दूकान के मुलाज़िम का भी था।  मैंने सब को नज़रअंदाज़ कर उस खानसामा टोपी वाले से कहा, क्या मटन है ?

उसने सर हिला कर मना कर दिया, मैंने फिर पूछा, मटन , गोश्त? उसने फिर मना कर दिया। अब मुझे अहसास हुआ कुछ गड़बड़ है, वो मुझे नज़र-अंदाज़ कर रहा है, कोई तवज्जो नहीं दे रहा है। मैं उलटे पाँव लौट आया।  मुझे अब गुड्डू पर भी गुस्सा आ रहा था और अपने आप पर भी। उसने पूछा क्या हुआ मैंने बेरुखी से कहा, उसके पास नहीं है।

कभी कभी इस तरह की यादें दिल में खटास पैदा कर देती हैं, ज़ेहन में ख़याल लूप की तरह बार बार आता है मुझे ऐसा करना चाहिए था वैसा करना चाहिए था। उस रोज़ भी योग के दौरान जब ये याद उभर आयी तो बेचैन हो गया, ग्लानि से भर गया। क्यों नहीं मैंने अंग्रेजी झाड़ी (उस वक़्त अंग्रेज़ी इस तरह कि नहीं थी) और उन मोहतरमा के पास जा कर कहा, “Isn’t staring considered rude?”       

Wednesday, May 22, 2024

ख़ा'ब - 2

 मेरे हाथ में एक पारदर्शी कांच का चौकोर बॉक्स था और मैं सड़क के किनारे खड़ा था। कोई 40 गज पर चौराहा था, जिस तरफ मैं खड़ा था उसी तरफ चौराहे के ठीक पहले एक जर्जर मकान था । हर आने जाने वाले शख्स से मैं कहता ये बॉक्स उस जर्जर मकान तक पहुँचा दो । लेकिन वो मुझे देखते और फिर बॉक्स कि तरफ और यकायक ही खौफ से पीछे हट जाते । ये सिलसिला कुछ देर चला फिर मैंने देखा के बॉक्स में कुछ इंसानी हड्डियाँ हैं, मुझे महसूस हुआ वो मेरी ही हड्डियाँ हैं और मेरा कोई जिस्म ही नहीं । 

उस वक़्त मुझे ख़याल हुआ, 'मौत कि हक़ीक़त अगर मा'लूम हो जाए तो क्या कोई जी सकेगा ?'

    

फिर मैं उठ गया ।


ख़ा'ब

 वो बदरंग मटमैला पहाड़ था, न कहीं घास थी ना कोई दरख्त । तलहटी में उसके एक बड़ा सुराख, इंसानों का बनाया हुआ। जब मैं अंदर दाखिल हुआ तो हैरान रह गया, अंदर ज़बरदस्त हलचल थी।सैकड़ों अफ़राद काम में जुटे थे, हर तरफ बांस के स्ट्रक्चर और खुदाई का साज़ ओ सामान बिखरा था। लेकिन गुफा के एक कोने शीशे का आलीशान हाल था, कान्फ्रन्स हॉल और वहाँ तमाम लोग सूट-बूट में घूम रहे थे बातें कर रहे थे । वहाँ मेरी मुलाकात हुई एक कोरियाई बिसनेस मैन से हुई । यूं तो वो ख़ुश नज़र आ रहा था लेकिन ये भी ज़ाहिर हो रहा था कि वह किसी कश्मकश से गुज़र रहा है । किसी अनहोनी का अंदेशा हवा में तैर रहा था । दरमियान हमारे कोई गुफ्तगु नहीं थी फिर भी बात हो रही थी। जान पड़ा के वो और उसका एक अमरीकी साथी चीन से साज-ओ-सामान खरीदते और मुनाफ़े में बेच देते । एक बुरा दौर आया, दोनों के दरमियान खटास पैदा हो गई, बिज़नेस भी बिखरने लगा ।

फिर हम दोनों हॉल के बाहर आ गए, गुफा के अंदरी कोने पर संकरी सुरंग का मुहाना था। सबसे ज्यादा काम वही हो रहा था, कोरियाई ने बताया चीन एक अंडरग्राउंड मोटरवे बन रहा है। सरहद के पार उसका ज़िम्मे का काम कब पूरा हो चुका था बस यहीं का हिस्सा बनाना बाकी था। इसी वजह से काम ज़ोर शोर से ज़ारी था ताकि मोटरवे को जल्दी से जल्दी शुरू किया जा सके।

 हम फिर हाल में आ गए उस कोरियन के स्टॉल पर एक ग़ैर मुल्की फ़र्द जो गुस्से में भी था, ना-उम्मीद भी और बे-बस भी साफ मालुम पड़ता था वो बकाया रकम की खातिर वहां आया था । उसे देख बड़बड़ाने लगा, अपने बकाया पैसे की वसूली के लिए ज़ोर देने लगा। कोरियन ने फ़ौरन ही अपना ब्रीफकेस खोला और चेक उसका नाम लिख दिया। वो फ़र्द हैरान रह गया, पैसे इतने आसान से मिल जायेंगे इसकी उसे रत्ती भर उम्मीद ना थी ।

 उसी वक्त एक हंगामा सा उठा, अफ़रा तफरी का आलम छा गया लोग मुस्तैदी से हॉल के बाहर निकल गए मैं भी तेज़ क़दम हॉल के बाहर आ गया । एक अजीब नजारा था सुरंग के मुहाने जो बांस की स्केफोलडिंग थी उस पर एक अमरीकी फ़र्द लटका हुआ था। उसके जिस्म पर बारूद की सलाखें बंधी थी । वो बार-बार कह रहा था कोरियाई को बुलाओ। 

मैं उल्टे पांव हॉल में चला आया। हाल तक़रीबन ख़ाली हो गया था। कोरियन के स्टॉल पर देखा तो काठ हो गया। टेबल पर कोरियाई पस्त पड़ा था, ढुलमुल और बे-जान, जबीं पर उसके छोटा सुरख, हाथ में, जो टेबल से नीचे लटका हुआ था, एक पिस्टल थी ।

 उसी व्यक्त मेरी आँख खुल गई ।


Thursday, October 26, 2023

मूल्यांकन

 मुझे ट्रैन का सफ़र पसंद है, सस्ता तो है ही अक्सर ही दिलचस्प वाक़िये भी पेश आ जाते हैं। हवाई सफर महंगा, उबाऊ और snobbery से भरा होता है , हर कोई अपने को तुर्रमखां से कम नहीं आंकता और अपने आप में ही दिलचस्पी रखता है । दिल्ली से बम्बई के लिए मैं राजधानी ट्रैन से ही जाता हूँ, यह साफसुथरी तो होती है, खाने-पीने का भी मुक़्क़मल इंतज़ाम रहता है लिहाज़ा सफर मज़े मज़े में निकल जाता है। इस मर्तबा मुझे अपनी उस ख़ास ट्रेन में टिकट नहीं मिला जो घर के पास के स्टेशन रूकती है सो इटारसी से होकर बम्बई जाने वाली राजधानी में सफर करना पड़ा। चूँकि ये ट्रैन लम्बे रास्ते से हो कर बम्बई जाती है इसलिए इसमें लम्बी दूरी के मुसाफिरों के बनिस्बत छोटी दूरी के मुसाफिरों की आवाजाही लगी रहती है। क़िस्मत से अभी पीक सीज़न नहीं है इसलिए ट्रैन में बहुत सी सीटें खाली थी सो पैर फैलाने का मौक़ा था।  मेरी बर्थ के बाजू एक झगड़ालु, अधेड़ उम्र व्यापारी था जो लगातार फ़ोन पर धंधे से मुत्तालिक़ बातें कर रहा था, एक हैंडबैग उसने बर्थ के बीच बने छोटे टेबल  पर रख दिया था जिससे उस टेबल को कोई और नहीं इस्तेमाल कर सकता था।  कुछ देर बाद वह बर्थ पर लम्बा हो गया और फ़ोन पर बातें करता रहा। इसी दौरान एक यंग लड़की आयी, उस व्यक्ति को देखा के वह उसके लिए बर्थ पर जगह बनाये लेकिन उस बद्तमीज़ ने कोई ध्यान नहीं दिया, लड़की ने बैग ऊपर की बर्थ पर रख दिया और फिर सैंडल उतार स्थाई तौर पर सीधे ऊपर चढ़ गई।  

तभी कैटरर सुपरवाइज़र आया और पूछने लगा कि यात्रीयों  को किस तरह का खाना चाहिए। मैंने कहा, 'वेज '। उसने पूछा, "नाश्ता?", मैंने कहा, "कटलेट"।

उसने उपेक्षा भाव से कहा, 'सर, केवल पोहा, उपमा या ऑमलेट।'

मुझे याद आया कि पिछली बार भी मुझे 'पोहा' लेने के लिए मज़बूर किया गया था।  मैं भड़क गया, 'तुम्हारा क्या मतलब है, मैं हमेशा कटलेट लेता हूं, तुम मेनू बदलने वाले कौन होते हो?'

उसने कुछ नहीं कहा और तुरंत ही चला गया। मेरी इस आक्रामकता का असर हुआ। झगड़ालू व्यापारी सहित सभी लोग मुझसे अदब से बात करने लगे। सौभाग्य से वह व्यापारी रात का खाना परोसे जाने से बाद लगभग 8:30 बजे ग्वालियर स्टेशन पर उतर गया। एक मुसीबत गई लेकिन दूसरा सेट आ गया। ग्वालियर में एक युवा जोड़े का परिवार आया, जिनके दो बच्चे थे, एक डेढ़ बरस का और दूसरा शिशु, उम्र में बमुश्किल एक साल का अंतर था। इधर मेरी बाजु वाली महिला सीट नीचे करने को बेताब हो रही थी और उधर हंगामा चल रहा था। वह बच्चा बहुत ही चंचल था, चीज़ें इधर उधर फेंकना, बैग खोलकर सामान निकालना वगैरह, रोकने पर ज़ोर ज़ोर से रोना, उसने अपनी मां को बदहाल कर दिया था, बेचारी इसे संभाले की गोद में बैठे शिशु को देखे। उसका पति सारी हलचल से बेखबर बुद्ध की तरह शांत दुनिया जहान से बेखबर बर्थ के दूसरे छोर पर बैठा रहा। रात का खाना खाने के बाद, मैं हाथ धोने चला गया, जब मैं लौटा तो मेरी तरफ की बर्थ नीचे आ चुकी थी। मैंने भी बिस्तर लगाया और सोने चला गया, समय रात के 9:30 बजे थे। लेकिन शांति नहीं थी वह शैतान बच्चा रोता ही जा रहा था, हंगामा बदस्तूर जारी रहा फिर लाइटें बंद कर दी गईं और धीरे-धीरे शांति छा गई।

आजकल अटेंडेंट डिब्बों को सबसे कम तापमान पर सेट करते हैं क्योंकि कोई न कोई ग्याडू हमेशा,गर्मी है, शिकायत करने आ जाता है। मुझे यह बहुत असुविधाजनक लगता है, शायद अधिकांश यात्रियों को असुविधा होती है लेकिन वे शिकायत नहीं करते । एक दो बार मैंने अटेंडेंट को  ब्लोअर की गति कम करने के लिए मजबूर किया, लेकिन अब मैं एक मोटी पूरी आस्तीन वाली टी-शर्ट रखता हूं, जिसे मैं अपनी नियमित टी-शर्ट के ऊपर पहनता हूं। यह डिब्बा भी पूरी तरह से ठंडा चल रहा था इसलिए मैं सुबह 4 बजे तक आराम से सोया, उसके बाद सुबह की चाय आने तक यूँ ही लेटा रहा। कैटरर ने मुझे जागते हुए देखा तो तुरंत चाय ले आया। मैं अभी भी 7:45 बजे बिस्तर पर ही था क्योंकि बाकी सभी लोग भी बिस्तर पर थे, कैटरर मेरे पास आया और फुसफुसाया, सर, आप कहां तक जाएंगे?

'बॉम्बे'

सर आपका नाश्ता ज़रा देर हो जाएगा, नासिक में कटलेट मिलेंगे।

अब, मुझे एहसास हुआ कि यह आदमी मुझसे क्यों पूछ रहा था कि मैं कहाँ उतरूँगा। अब तक मैं भी शांत चुका था इसलिए बेफिक्र हो बोला,

'कटलेट भूल जाओ, ऑमलेट ले आओ ।'

वह खुशी-खुशी चला गया.

लगभग 8:00 बजे सभी लोग उठ गए, बीच की बर्थ उठने लगी और उद्धंड बच्चा जाग गया। युवा दुल्हन को 3-6 महीने के शिशु के साथ-साथ इस अतिसक्रिय बच्चे की भी पूरी देखभाल करनी थी। उसका पति, बुद्धा की तरह शांत, इयरफोन कान में लगाए हुए अपनी पत्नी द्वारा झेली जा रही तकलीफों से बेखबर बर्थ के अंत बैठा रहा। जो युवा युवा महिला मेरे पास बैठी थी, उसने नवजात शिशु को उठाया, जिससे असहाय पत्नी को बड़ी राहत मिली। बर्थ के बीच मेज़ पर स्टील का गिलास पानी से आधा भरा हुआ था, इस बच्चे ने उसे गिरा दिया जिससे पानी फर्श पर फैल गया। मैं वहां चल रहे इस हंगामे से बेचैन हो रहा था, तभी मेरे बगल वाली लड़की ने कहा, 'आप अपना बैग उठा लो, गीला हो रहा है।'

मुझे एहसास हुआ कि मेरा शोल्डर बैग ठीक उस मेज के नीचे रखा हुआ था जहाँ इस बच्चे ने गिलास गिराया था। मैंने बिना एक भी शब्द कहे गुस्से भरी नजरों से उसकी ओर देखा और अपना बैग उठाया, बैग नीचे की तरफ से गीला था।

नासिक में, इस महिला ने अपने पति से बच्चों के लिए दूध लाने के लिए कहा। बुद्धा , बिना कुछ कहे, तुरंत नीचे उतर सेंटेड दूध की दो छोटी बोतलें ले आए। उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया, यह आदमी बुरा या उदासीन या मतलबी नहीं है, वह तो सिर्फ अपने परिवेश, अपने समाज की परंपरा का प्रोडक्ट है।  मैंने उससे कहा, 'तुम  एक बच्चे का ख्याल क्यों नहीं रखते, क्या देखते नहीं कि आपकी पत्नी कितना परेशान हो रही है ?'

इससे पहले कि वह कुछ कह पाता, उसकी पत्नी उसके बचाव में कूद पड़ी, 'वो बहुत मदद करते हैं'

अब गलती किसकी है, कहना कठिन है। जीवन बहुत ही कॉम्प्लेक्स है, आप केवल स्वयं का ही मूल्यांकन कर सकते हैं, किसी और का नहीं ।

Friday, February 24, 2023

उरूज़-ए-शायरी

 

एक मर्तबा एक उर्दू बज़्म में मेरी शायरी की तनक़ीद हो गयी।  एक साहिब ने फ़रमाया, साहिब आपका कलाम खारिज़-अज़ -बहर है।  उस वक़्त तो मैंने कह दिया के मेरा कलाम किसी उरूज़-ए-फन-ए-शायरी का पाबन्द नहीं, मैं आज़ाद नज़्म कहता हूँ। लेकिन बाद में सोचा क्या हर्ज़ है क्यों न ग़ज़ल के उसूलों की मालूमात हासिल कर ली जाय। सो एक दिन दोपहर बस पकड़ कर मुहम्मद अली रोड पहुँच गया, ऑफिस में मेरे आने जाने पर कोई पाबन्दी नहीं थी और उस रोज़ कोई काम भी बाक़ी नहीं था । इल्म था के हर मस्जिद में एक मदरसा होता है सो किसी मौलवी साहिब को पकड़, उर्दू के साथ साथ उरूज़-ए-शायरी भी सीख ली जाय। दांव थोड़ा टेढ़ा  पड़ा, दरअसल मोहम्मद अली रोड गुजराती मुसलमानों का इलाक़ा है । ये लोग अमूमन तिज़ारती धंधे से वाबस्ता है, खोजा कम्युनिटी और बोहरा समाज से जाने जाते हैं। बोहरा लोग दुसरे मुसलामानों से हर लिहाज़ से अलहदा हैं, इनकी पोशाक ज़्यादातर सफ़ेद होती है और एक खसूसी क़िस्म की कटोरी नुमा स्कल कैप पहनते हैं। ख़वातीन सफेद या दुसरे चटकीले रंग का बुर्क़ा पहनती हैं  काला तो हरग़िज़ नहीं और इनकी ज़बान गुजराती है। मुसलमानों में ये लोग अधिक धनी हैं और दूसरों मुसलमानों से दूर ही रहते हैं।

दोपहर की नमाज़ हो चुकी थी लोग सफ़ेद कटोरी टोपी पहने मज़े मज़े अपने अपने घर, ऑफिस, दूकान को जा रहे थे। मस्जिद के बाहर ही मैंने एक भले से दिखने वाले शख्स को पकड़ लिया,  कहा, भाई साहिब, मुझे उर्दू सीखनी है। वह मुझे अजूबा समझ देखता रह गया, बोला, बाबा मैं क्या कर सकता, ज़रूर सीखो।

तब मैंने कहा मस्जिद मैं मौलवी साहिब क्या उर्दू सिखा सकते हैं ?अब उसकी लाइट जली, कुछ धिक्कार भरे टोन में कहने लगा, अरे बाबा आप उधर बायकुला जाओ वहाँ यू पी वालों की मस्जिद है। वहाँ आप को उर्दू सिखाने वाला मिल जाएगा।

बायकला, जहां मैं था, वहाँ से कोई एक किमी दूर होगा और चूंके मुझे यूँ ही सडकों पर आवारा घूमना पसंद है इसलिए मैंने मेन रोड छोड़ दी और रफ्ता रफ्ता गली गली कूचा कूचा बायकला की जानिब निकल पड़ा।  जिस एरिया का ज़िक्र हुआ था वह एक बेतरतीब बसा मुस्लिम ghetto था। जहां इंसान के रहने को बुनियादी सहूलियत मयस्सर नहीं थी। हर सू ग़ुरबत का आलम लेकिन बावजूद इसके लोग जी रहे थे, स्कूल जाते बच्चे, घरों में में काम करने को जाती ख़वातीन और मर्द भी किसी न किसी धंधे से जुड़े कमाधमा रहे थे। मस्जिद के आगे एक पान की दुकान भी थी। बस फिर क्या था मैं उस पान की दुकान पर पहुँच गया। जब पानवाला फुर्सत में आया तब मैंने पूछा क्या यहां उर्दू सीखने का कोई ज़रिया है। उसने मुझ पर एक गहरी निग़ाह डाली, शक्ल-ओ-सूरत देख कर सारे ज़माने की कडुवाहट और नफरत मुझ पर उढेल दी। उसकी इस नफरत भरी निगाह से मैं दिल के गहरे गोशे तक सिहर गया। बर-अक्स, बाजू में खड़े एक खस्ताहाल ब्रीफ़केस लिए और खस्ताहाल सूट पहने अधेड़ उम्र शख्स ने मुझे दिलचस्प निगाह से देखा और पूछा, आप उर्दू किस सिलसिले में सीखना चाहते हैं।   

जी, उर्दू सीखना ख़ास मक़सद नहीं लेकिन मुझे उर्दू शायरी का शौक़ है लिहाज़ा ग़ज़ल और तमाम शायरी के उसूलों से वाक़िफ़ होना चाहता हूँ।

उसने फ़ौरन ही अपना फटेहाल ब्रीफकेस खोला और एक डायरी निकाल ली, कहने लगा, वह भी ग़ज़लगोई का शाहकार है और पेज पलट कर अपने किसी ख़ास कलाम को ढूँढने लगा। हमारे दौरान होने वाली गुफ्तगू से, पानवाले की बर्ताव में मज़ीद फ़र्क़ आ गया, अब वो ताब-ओ-तेज़ नफरती अंदाज़ से जुदा एक हमदर्द वाला लहज़ा था, कहने लगा, लीजिये मौलवी साहिब आ गए हैं इनसे बात कर लीजिये, ये आप का उर्दू भी और अरबी भी सीखा देंगे। 

मौलवी साहिब बमुश्क़िल 25 बरस उम्र के रहे होंगे शायद हाल ही में इम्तिहान पास किया होगा। सफ़ेद कुर्ता और एड़ी से ऊँचा तंग पजामा, सफ़ेद टोपी और हाथ में चंद किताबें; बदहवास और परेशान से नज़र आ  रहे थे। पानवाले ने उन्हें  आवाज़ दी और बताया की मुझे उर्दू सीखना है। मौलवी साहिब जो अब तक अन्यमनस्क  नज़र आ रहे थे अब पुरजोश मेरी और मुख़ातिब हुए, कहने लगे ज़रूर सीखा देंगे। मैंने पूछा के क्या वे ग़ज़ल, रुबाई  और मुख़्तलिफ़ नज़्म से मुताल्लिक़ उरूज़ का भी इल्म रखते हैं तो उन्होंने हामी भर दी। पूछा, सब सीखने के लिए कितना वक़्त लगेगा तो वे सर खुजा कर बोले तीन महीने तो दरकार होंगे ही।  मैंने कहा, भला तीन महीने क्यों? तो कहने लगे, भाई साहिब एक महीना तो उर्दू और उरूज़ पर ही ज़ाया हो जाएगा, अरबी सीखने में ज़्यादा वक़्त लगता है।  मैंने कहा, मौलवी साहिब मुझे अरबी नहीं सीखनी, आप बस उर्दू और शायरी के तौर तरीक़े  समझा दें , महिना भर काफी होगा।  कहने लगे, अगर अरबी नहीं सीखनी तो महीना भर काफी होगा। तब मैंने उनकी फीस का ज़िक्र किया तो कहने लगे, वे 200 रु महीना अपने तालिबान से लेते हैं लेकिन आप शौक़िया उर्दू सीख रहे हैं लिहाज़ा आप से 150 रु ही लूंगा। 

यह सुन कर मैं सकते में आ गया। मेरे दिल में एक तीखी कसक सी उठी, दिल बैठ सा गया, ये कैसी तिलिस्मी दुनिया है, ये कैसे लोग हैं, क्या ये वाक़ई हक़ीक़त है ? नब्बे की दहाई का दौर था तो भी उस वक़्त 200 रु की कोई ख़ास क़ीमत नहीं थी। आप अंदाज़ा करें की सिनेमा का टिकट उस वक़्त 50 रु का मिलता था और ये कह रहा है 150 रु में रोज़ाना एक घंटा मुझे पढ़ायेगा! मैं अपने ज़ेहन में 1000 रु बजट ले कर चला था। मैंने कहा, नहीं मौलवी साहिब मैं आप को 300 रु दूंगा, तालिब तो कमाते नहीं है मुझे कोई रियायत की ज़रुरत नहीं। मेरी बात सुन पानवाला कहने लगा मौलवी साहिब आप चाहें तो ये 400 रु भी दे देंगे। मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और कहा के कहाँ आप तालीम देंगें। मौलवी साहिब कहने लगे जहां आप कहें मैं हाज़िर हो जाऊँगा। मैंने कहा मेरा घर तो गोरेगाँव में है  वह बहुत दूर है सो मुमकिन नहीं  वहाँ आप आ सकें सो आप ही बताएं मैं कहाँ आ जाऊं ?  मौलवी साहिब ने कहा, के मैं आप के ऑफिस हाज़िर हो सकता हूँ, लेकिन मेरे लिए ये मुनासिब न था और मौलवी साहिब को कोई दूसरी जगह नहीं मिली सो मामला वहीं अटक गया।

अब तक वह शरीफ आदमी जो ब्रीफ़केस लिया पास खड़ा था, हमारे दरमियान होनेवाली गुफ्तगू में कोई दखलंदाज़ी से बच रहा था लेकिन जब मामला स्टेल-मेट पर पहुँच गया तो कहने लगा, आप मेरे साथ चलिए, घंटे भर में मैं आप को ग़ज़ल की बारीक़ियों से वाक़िफ़ करा दूंगा। मैंने कहा, कहाँ ?तो कहने लगा, पास ही उसका कमरा है, पांच मिनट की दूरी पर। तो मैंने कहा, चलिए। उसने ब्रीफकेस उठाया और चल दिया और मैं ऐन उसके पीछे पीछे। मस्जिद से थोड़ा ही आगे बढे थे की उस आदमी ने मेन रोड छोड़ एक गली का रुख अख़्तियार कर लिया । गली बमुश्क़िल 3 फ़ीट चौड़ी थी और उसके बीचों बीच संकरा नाला बह रहा था। दोनों तरफ टीन -टप्पर से बनी झोपड़-पट्टियां थी। ये दुनिया कोई माया नगरी लग रही थी, ऐसी जगह मैं कभी नहीं आया था। ज़ेहन के एक गोशे में ख़याल उभरा कि मैंने क्या कोई भारी ग़लती कर डाली है। आगे एक अजनबी और आजू -बाजू तिलिस्मी दुनिया। ज्यों ज्यों गली नागिन की तरह बलखाती आगे बढ़ती त्यों त्यों मेरे अंदर दहशत का ग़ुबार घर करने लगा। अगर मुझे यहां क़त्ल कर दिया गया तो किसी को कानोकान खबर न होगी या अगर यहां आग लग गयी या कोई दूसरा हादसा हो जाय तो बचने का कोई रास्ता न मिलेगा। दर हक़ीक़त दोनों ही मुआशरे, मुसलमानों और हिन्दुओं, के दरमियान सतह से नीचे एक तल्खी, शक़ और नफरत का अंडरकरंट है जिसकी वजह से दहशत होती है। यहां में तरह तरह के अंदेशों  में घुल रहा था और आगे वह शख्स बेपरवाह उन तंग गलियों में आगे बढ़ता जा रहा था। जैसे जैसे  हम आगे बढ़ते गए वैसे वैसे उस आदमी के मिज़ाज और अंदाज़ में मुझे तब्दीली महसूस हुई। अब वह उस कॉन्फिडेंस से आगे नहीं बढ़ रहा था, शायद अपने फैसले को दोबारा असेस कर रहा था।

आख़िरकार हम एक चौड़ी सड़क के किनारे पहुँच गए जहां जा कर वह आदमी ठिठक गया। सड़क के दूसरी तरफ भी वैसा ही झोपड़-पट्टी का संसार था जैसा हम अभी अभी लांघ कर आये थे। उसके चेहरे पर गहरी पसमांदगी और लज़्ज़ा का भाव साफ़ नज़र आ रहा था, गोया ग़ुरबत कोई जुर्म हो। घर ले जा कर वह अपनी अस्मत तार तार नहीं होने देना चाहता था। उसकी उलझन मैं समझ रहा था। तब उसने सामने एक टीन के दो-मंज़िले घर की तरफ इशारा कर कहा, वो ऊपरवाला मेरा कमरा है।

उसे ज़्यादा दुविधा में न डालने के मक़सद से मैंने कहा, देखिये जनाब, वक़्त बहुत हो गया है, मुझे घर चलना चाहिए। आप बता दें यहां से बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन का रास्ता किधर से है। उसने कोई एहतजाज़ नहीं किया और बोला, ये सड़क बायीं बाजू  2  मिनट में मराठा मंदिर पहुंचा देगी, सामने ही बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन है।

 बस उसे वहीं छोड़ मैं घर चला आया।


Bizarre House - II

 The house we lived in Kanpur was a soldier’s barrack turned into quarters. A long shed like structure converted into four dwelling units, m...