प्राचीन काल में त्रिस्ता नदी के तट ऋषिवर तुंडकेतु का आश्रम था। तुंडकेतु की छत्रछाया में अनेक ऋषि और विद्यार्थी श्रमपूर्वक अध्यन और तप कर रहे थे। कालांतर में तुंडकेतु का एक प्रतिभाशाली तेजस्वि पुत्र हुआ। ऋषिवर ने पुत्र का नाम कृष्ण गन्धवह रखा। पुत्र अत्यंत ही मेधावी था। चार वर्ष का होते होते उसने सभी वेदों में पारंगता प्राप्त कर ली थी; छह वर्ष होते होते वह वेदांत में भी पारंगत हो गया और शास्त्ररार्थ में अपने से कई वर्ष वरिष्ठ विद्यार्थियों और ऋषियों को परास्त करने लगा।
सात वर्ष का होते होते आश्रम में तुंडकेतु के अतिरिक्त कोई भी ऐसा नहीं था जो उस के साथ शास्त्ररार्थ कर सके। अब गन्धवह सभी को 'वत्स' कह कर पुकारने लगा। पहले तो सबने इसे हंसी में टाल दिया पर जब गन्धवह अपने व्यवहार से विचलित नहीं हुआ तो सभी आश्रम में रहने वाले ऋषियों ने तुंडकेतु से इस बात का आक्षेप लगाया कि गन्धवह उन सभी को वत्स कह कर उनकी अवहेलना करता है अपमान करता है। यह सुनकर तुंडकेतु चकित रह गए, गन्धवह के व्यवहार से पीड़ित हो गए। तब उन्होंने गन्धवह को बुलाया और अपने व्यवहार का कारन बताने को कहा। तब गन्धवह ने कहा :
ज्ञानं प्रदाता शिष्येभ्यः वरिष्ठः।
(Seniority is not by birth but by knowledge. The one who imparts knowledge is senior)
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