प्राचीन काल में वितस्ता नदी के तट पर ऋषिवर मुंडकेश्वर, 5000 गाय सहित, एक विशाल आश्रम में रहते थे । अनेक ऋषि और सैकड़ों विद्यार्थी वहां रह कर तप और अध्ययन करते थे। प्रायः यज्ञ का आयोजन कर इंद्र एवं अन्य देवों को प्रसन्न किया जाता था। देवों की प्रसन्नतावश सब सुचारु चल रहा था न अत्यधिक वर्ष होती थी न ही सरिता में आप्लव होता न अकाल पड़ता था। 5000 गौओं के कारण दूध और धृत की कमी न थी। सब कुछ ठीक चल रहा थी की आपदा आ पहुंची। पास के जंगल में तमवात नाम का दैत्य आ पहुंचा और यज्ञ में विघ्न डालने लगा , गौवें उठा कर ले जाता। जब तमवात का उत्पात सीमा से बहार हो गया तब ऋषिवर मुन्डेक्श्वर ने "रज्जुप्रग्रहम" यज्ञ का आयोजन किया। दो दिवस तक प्रचंड मंत्रोचारण उपरान्त अश्विनीकुमारों को प्रकट होना पड़ा। तब ऋषिवर मुंडकेश्वर ने 1000 नामों से अश्विनों की वंदना की जिससे वे प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। ऋषिवर ने तमवात को रस्सी से जकड कर प्रस्तुत करने को कहा। तथास्तु कह अश्विन अंतर्ध्यान हो गए।
कुछ ही क्षणों में महाकाय तमवात यज्ञ शाला के पास पड़ा था। तब बंधन जकड़े तमवात ने कहा, 'मुनिवर आप महान तपस्वी हो, यज्ञ के ताप से मैं यहां बंधन में जकड़ा हुआ हूँ, मेरा क्या दोष है और आप मेरा क्या करेंगे?
मुनिवर, 'तमवात, तुमने अकारण ही यहां यज्ञ में विघ्न डाला और गौओं को उठा कर ले गए , ये तुम्हारा अपराध है। तुम्हें श्राप देकर मैं तुम्हें व्याघ्र योनि में डाल दूंगा। '
'परन्तु मुनिवर मैं दैत्य हूँ, उत्पात करना मेरा स्वाभाव है और गौ मेरा भोजन, ये कैसा अपराध? अतिरिक्त, अगर आप मुझे श्राप देंगे तो आपके दस वर्षों के तप की ऊर्जा का ह्रास होगा और आप इस आश्रम में सभी ऋषियों के गुरु नहीं रह पाएंगे।'
'तुम दैत्य हो तुमसे शास्त्रार्थ वर्जित है। '
'आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः' यह वेद वाक्य है इस दृष्टि से मेरे दैत्य होने पर भी आप मुझ से ज्ञान अर्जित कर सकते हैं अतः मुझ से शास्त्रार्थ पूर्णतः शास्त्र संगत है।'
अस्तु ! मैं तुमसे शास्त्रार्थ को प्रस्तुत हूँ।
मुनिवर की स्वीकृति होते ही, छात्रों ने यज्ञशाला के समीप की भूमि साफ़ कर दी और जल का छिड़काव किया। इसके मध्य एक चौकोर वेदी बनाई गई, फूलों से सज्जित कर दीप प्रज्ज्वलित कर दिया। धुप की सुगंध वातावरण में आच्छादित हो गई। दो मृगछाला वेदी के दोनों तरफ बिछा दी गई। पांच वरिष्ठ ऋषि निर्णायक की भूमिका में तत्पर हो मृगछालाओं के सम्मुख बैठ गए। मुनिवर मुंडकेश्वर ने भी एक तरफ बिछी मृच्छाला पर आसान ग्रहण किया। तब उन्होंने अपने सबसे उद्धण्ड शिष्य भास्कर से कहा, 'आदरणीय तमवात के पैर धोएं।
मुनिवर, 'नहीं, शास्त्रार्थ को प्रस्तुत व्यक्ति पूजनीय है। '
मनमसोस कर उद्धण्ड भास्कर को तमवाप के पैर धोने पड़े। तब मुनिवर ने एक अन्य अनाज्ञाकारी शिष्य, आनंदकर को तमवाप को चन्दन का तिलक लगाने को कहा। कर्मकांडी और दकियानूसी आनंदकर ने भी नाकभौं सिकोड़ कर तमवाप को चन्दन का तिलक लेप किया। मुनिवर ने आनंदकर को फटकार लगायी, अनिच्छा से कार्य नहीं करना चाहिए।
निर्णायक मंडली ने निश्चय किया चूँकि, तमवाप ने शास्त्रार्थ की चुनौती दी अतः, प्रश्न का प्रारम्भ मुनिवर मुंडकेश्वर करेंगे।
शास्त्रार्थ :
तमवाप : स्या सूत्र बादरायण रचित ब्रह्मसूत्र का पहला सूत्र है। शब्दार्थ तो 'अब हम ब्रह्म जिज्ञासा करें' परन्तु गूढ़ अर्थ; ब्रह्म पूर्ण है, समस्त है, सर्व व्याप्त है, निर्गुण है हर आयाम , हर वस्तु, हर जीव का मूल है स्रोत है अतः उसकी जिज्ञासा अनिवार्य है।
मुंडकेश्वर : साधु !साधु !
तमवाप : विष्णु क्या है , जीवात्मा या परमात्मा ?
मुंडकेश्वर : विष्णु परमेश्वर है, जगत का संरक्षक, पालन कर्ता है।
तमवाप : परन्तु जीवात्मा है कि परमात्मा है ?
मुंडकेश्वर : विष्णु स्वयं ब्रह्म है, परमात्मा है।
तमवाप : अगर विष्णु स्वयं ब्रह्म है तो उस दृष्टि से हम सभी ब्रह्म हैं "अहं ब्रह्मास्मि" विष्णु में विशेष क्या है । वह भी कर्म करता है, दस्युओं का वध करता है, भक्तों, ऋषियों को संरक्षण प्रदान करता है। ये कर्म है और इसका कर्मफल होगा तो कर्मफल का भोग कौन करेगा।
मुंडकेश्वर : ईश्वर कर्मफल से परे है वह पूर्ण ब्रह्म है ।
तमवाप : अगर ईश्वर पूर्ण ब्रह्म है तो वह मोक्ष प्राप्त है फिर सगुण क्यों, कर्म क्यों ? कर्म वो करता है जो किसी योनि में जीव है , ईश्वर की क्या योनि है ? कर्म करने वाला वह पूर्ण ब्रह्म नहीं हो सकता।
मुंडकेश्वर : ईश्वर की कोई योनि नहीं , मैं बार बार कह रहा हूँ की वह स्वयं ब्रह्म है।
तमवाप : आप जो कह रहे हैं उसमें घोर विरोधाभास है। पूर्ण ब्रह्म मोक्ष से प्राप्त होता है। मोक्ष के पर्यन्त अहम का नाश हो जाता है, जीव भावहीन, मोहहीन, विरक्त महाब्रह्म में विलीन हो जाता है। कर्म के लिया माया मोह भाव आवश्यक है अतः विष्णु पूर्ण ब्रह्म नहीं है। फिर वह किस योनि में स्थापित है?
मुंडकेश्वर : मुझे नहीं पता।
यह कह कर मुंडकेश्वर ने दीपक बुझा अपनी हार स्वीकार कर ली।
अब निर्णायकगण ऋषि परामर्श करने लगे। कुछ समय पश्चात वरिष्ठ निर्णायक मुनि ने तमवात की तरफ दृष्टि डाली, कहने लगे, 'हे तमवात, पूर्व में श्रावस्ती नगर में ममता नाम की परम विदुषी का निवास था। किसी भी समस्या का तर्कसंगत समाधान उसके पास था। नगर के धनपति, राजनितिक अधिकारी, कोतवाल और साधारण नागरिक, सभी उसके पास परामर्श के लिए आते थे। उसकी ख्याति नगर के पर्यन्त भी फैली हुई थी। एक बार वेद तिमिरम नाम का श्रेष्ठि उसके पास आया और कहने लगा, देवी आप परम विद्वान हैं अतः यदि मैं आपके प्रश्न का उत्तर न दे सका तो आपको 10 स्वर्ण मुद्रा दूंगा परन्तु यदि आप मेरे प्रश्न का उत्तर न दे सकी तो आपको मुझे 100 स्वर्ण मुद्रा देनी होंगी। देवी ममता इसके लिए सहर्ष मान गयी। तब श्रेष्ठि ने प्रश्न किया , 'ऐसा कौन सा जीव है जो तीन पैर से चलता है, उसके दो मुख हैं और एक छलांग में हिमालय चढ़ जाता है ?
अब बेहया वेद ने अपनी झोली से 10 स्वर्ण मुद्रा निकाल कर देवी ममता को प्रस्तुत कर दी और कहा मुझे भी नहीं पता और अपनी राह चला गया।
तमवात, हमारा निर्णय है के यदि तुमने अपने प्रश्न का तर्कसंगत और संतोषजनक उत्तर दिया नहीं दिया तो तुम्हें शास्त्रार्थ का विजेता नहीं घोसित किया जाएगा।
तमवात : अवश्य मुनिवर। आपकी आशंका निराधार नहीं। मैं पूरी चेष्टा करूंगा की मेरा उत्तर आप लोगों को संतुष्ट कर दे। अस्तु !
विष्णु कौन है? विष्णु , द्रव्यमान रहित, अमूर्त तरंगित माया हैं। जिस तरह 'विचार' का द्रव्यमान नहीं होता, अमूर्त होता है फिर भी जीव को प्रभावित करता है उसी तरह माया भी अमूर्त है उसका स्वरुप नहीं परन्तु वह जीव को प्रभावित करती है। माया कर्म और कर्म फल से परे है , न वह जीवात्मा है न परमात्मा है वह छलावा है, मृगमरीचिका। विष्णु माया ही हैं।
मुनिगण : साधु !साधु ! अंत्यंत हर्ष से हम घोषणा करते हैं के तमवात शास्त्रार्थ में विजयी रहे।
उसी समय व्योम में मेघ आंदोलित हो उठे, भीषण गड़गड़ाहट से चपला चमत्कृत करने लगी और फिर आकाशवाणी हुई ,
"तमवात , तुम श्राप मुक्त हो गए हो , अपने मूल रूप काली हवा को प्राप्त हो जाओगे। "
उसी क्षण तमवात में परिवर्तन हुआ , उस स्थान पर स्नीकर्स, जीन्स और टी-शर्ट पहने टकला व्यक्ति खड़ा था। काली हवा !
इति कथा।
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