शोर तो वह लोग करते हैं जिन्हें अभी अपना रिकॉर्ड बजाना बाक़ी है।
Monday, December 20, 2010
दरवाज़ा ..........
शोर तो वह लोग करते हैं जिन्हें अभी अपना रिकॉर्ड बजाना बाक़ी है।
Wednesday, December 08, 2010
प्यासा कौआ !
ज़िन्दगी निहायत ही संजीदा शै है. .....
अगर यर सोच है की कोई उदार और कुशल तानाशाह आयेगा और हमारी समस्याओं का चुटकी में निदान कर देगा तो ये सोच बेबुनियाद है. संभावना ज्यादा है के वह अपनी जेब भरेगा और चलता बनेगा.
Wednesday, November 17, 2010
लामा
कठिन अनुशासन ने उसे शरीर का तापमान नियंत्रित करने में सफल बना दिया था और तत्वों के साथ संतुलन स्थापित करने का सामर्थ्य भी. वह अंधेरे में और उजाले में भी सामान रूप से सत्चितानंद स्थिति में था. साधारण मनुष्यों के विपरीत जीवनचर्या से उसे अपने अस्तित्व के विघटन होने का डर जाता रहा, मात्र एक जीवन के लिए प्राकृतिक प्रतिक्रिया के स्तर तक रह गया. तर्कसंगत सोच ने उसे मृत्यु के विषय में पूरी तरह उदासीन बना दिया था. बावजूद इसके वह फिर भी कबूतरों की जोड़ी का बेसब्री से इंतज़ार करता था.
एक रोज़ वह जोड़ा नहीं आया. वह इंतजार करता रहा ... ... ... ... ..
उस दिन उसने महसूस किया वह तो सिर्फ एक साधारण नश्वर है, जिसे विविध तापमान और अकेलेपन को झेलने का सामर्थ्य है. उस रोज़ वह बुद्ध बन गया !
Tuesday, November 16, 2010
वह दरख़्त गर्भ से था !
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
इस शेर से मुझे कॉलेज के दिन याद आ गए. उस दौरान हम अक्सर शाम के वक़्त लम्बी सैर पर निकला करते थे. चूंके कॉलेज शहर से दूर था लिहाज़ा कैम्पस दूर तक फैला हुआ था, जगह जगह निर्जन विस्तार! हम नित्य ही सैर के लिए नए रास्ते ढूंडा करते थे. एक रास्ता जो के छात्रावास समूह के अंत पर स्थित पुलिया के पार हो कर दूर मोड़ पर स्थित महिला छात्रावास हो कर गुजरता था, हमें खास प्रिय था. पुलिया के पार सड़क के एक ओर कॉलेज द्वारा एक विशाल गड्ढा किया गया था, स्विमिंग पूल बनाने के लिए, लेकिन पैसा न आने की वजह से वह गड्ढा एक भद्दे दाग के नुमा वहां एक अरसे तक मौजूद रहा. जैसे ही सड़क छात्रावास समूह से पार उठती और पुलिया से नीचे उतरती एक तरफ वह विशाल गड्ढा नज़र आता और दूसरी तरफ दूर दूर तक फैले निर्जन में एक अकेला दरख्त! वह वृक्ष विशेष था नितांत अकेला. उसका तना निहायत ही चकना था यूकलिप्टस के दरख्त के मानिंद. तना लगभग हमारी उंचाई तक उठा था फिर दो आसमान की तरफ लपकती शाखाओं में विभाजित हो गया. जिस स्थान पर तना विभाजित हुआ था वहां पर एक ध्यान आकर्षित करने वाला उभार था. ऐसा प्रतीत होता था मानो वह वृक्ष गर्भ से है. मैं उसे 'Pregnent Tree' कहता था.
क्या आश्चर्य के उस दरख्त ने कभी भी प्रसव नहीं दिया? ज़िन्दगी उन के लिए खुशनुमां है जो उसे प्रसव से जानते हैं. उम्मीद उन्हें जीने का सहारा देती है..........
Tuesday, February 02, 2010
बीती विभावरी जाग री.....
अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा घट उषा नागरी
खग कुल कुल सा बोल रहा
किसलय का अंचल दोल रहा
लो लतिका भी भर लायी
मधु मुकुल नवल रस गागरी
अधरों में राग अमंद पिए
अलकों में मलयज बंद किये
तू अब तक सोयी है आली
आँखों में लिए विहाग री
--- जय शंकर प्रसाद
Wednesday, February 25, 2009
वजू़द! (भाग १)
समुद्र के छोर पर खडा एक व्यक्ति जिसे इस बात का क़तई आभाष न था के दुनिया गोल है, विचार करने लगा आखिर इस क्षितिज तक फैली जलराशी के अंत पर क्या है? वह अभिभूत था लिहाज़ा एक कठोर और परीक्षापूर्ण यात्रा पर निकल पड़ा. वह साहसी और दृड़ निश्चयी था इस लिए निरंतर एक ही दिशा में आगे बढ़ता चला गया, उसने समुद्र पार किया, जंगलों को पर किया और ऊँचे पर्वतों पर विजय पाई और अंततः उसी स्थान से गुज़र गया जहाँ से चला था. इस दौरान दुनिया ही बदल गयी थी अनायास ही वह बोल पड़ा, "यह कुछ जाना पहचाना दिखता है!"
हम उस व्यक्ति की तरह ही हैं हर वक़्त सवाल करतें हैं उसके बाद क्या, उसके बाद क्या? नेति नेति की तरह ही ये सभी सवाल बेमानी हैं. दिशाएं अनंत पर नहीं विलुप्त हो जाती है और न ही समय अंतहीन होता है ये सभी आयाम दरअसल एक लूप के मानिंद हैं जहाँ से चले थे वहीं समाप्त हो आते हैं अर्थात इनका कोई अंत नहीं जिस प्रकार परिक्रमा का कोई अंत नहीं होता.
जारी है.......
Sunday, February 08, 2009
यज्ञ!
जब से मनुष्य ने औज़ारों का इस्तेमाल करना सीखा वह अपने मुख्य प्रतिद्वंदी यानी ऊँचे दर्जे के मांसभक्षियों से आसानी से निजात पा गया लेकिन आकस्मिक और अबोध प्राकृतिक आपदाओं जैसे बिजली का गिरना अथवा बाढ़ इत्यादि द्वारा होने वाली मृत्यु से लड़ने का उन्हें कोई उपाय न सूझा. किंतु यह अनुमान लगाने में उन्हें कोई दिक्कत शायद न पेश आई होगे की ये अदृश्य शक्ति भी अन्य जीवों की तरह जीवन का क्षय भक्षण के लिए ही करती हैं, लिहाज़ा अपने स्वाभाविक प्रकृति के अनुरूप उन्होंने सौदा किया होगा, स्वयं ही जीवन उपहार में देना. अब चूंके प्राकृतिक आपदाओं का कोई निश्चित समय तो होता नही, निश्चय ही कभी काफ़ी वक्त तक कोई घटना न घटी हो जिस से उनका इस सौदे में यक़ीन पुख्ता हो गया होगा. और जब ऐसा न हुआ तो कबीलाई मुख्या अथवा उसके सलाहाकार ने अनुमान लगाया के शायद 'शक्ति' ने बलि देखी ही नही लिहाज़ा उन्होंने आग जलाई होगी और शोर किया होगा ताके 'शक्ति' बलि देख ले. बावज़ूद इसके भी अगर घटना चक्र चला तो शायद उन्हें लगा होगा के 'शक्ति' ने सौदा अस्वीकार कर दिया है इसलिए बड़ी जाति के जानवर की बलि दी होगी और ऐसा करते करते मनुष्य की बलि तक पंहुच गए होंगे!
इसमें कोई हैरत की बात नही के आज भी ईश्वर से डरा और उसे तुष्ट किया जाता है. अगर वह दयालु होता तो क्या किसी को उसकी परवाह होती?
रात 12 बजे चंडाखाल की सैर
चंद रोज़ क़बल मोहतरम मोनू साहिब की श्री बडोलगांव आमद हुई। जनाब 3 किलो मुर्गा लेकर हाज़िर हुए और फर्माइश की कि मुर्गा भड्डू मे ज़ेर-ए-आसमान प...
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सवाल उठता है की क्या समाज में नैतिक व्यवहार (ethical behavior) धर्म की वजह से है और अगर ऐसा है तो धर्म की आवश्यकता अपरिहार्य है अन्यथा धर्म ...
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शिशिर कणों से लदी हुई कमली के भीगे हैं सब तार चलता है पश्चिम का मारुत ले कर शीतलता का भार भीग रहा है रजनी का वह सुंदर कोमल कबरी भाल अरुण किर...
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कृष्ण गन्धवह बड़ा हुआ और पिता की आज्ञा ले कर देशाटन को निकल गया। मेधावी तो था ही शास्त्रार्थ में दिग्गजों को पराजित कर, अभिमान से भरा वह ...